Saturday, January 1, 2011

GANGA SAGAR


गंगासागर की एक यात्रा 

    जनवरी की भरी सर्दियों में घर से बाहर कहीं यात्रा पर जाना एक साहस भरा काम है और यह साहस भरा काम भी हमने किया इसबार गंगासागर की यात्रा पर जाकर। भारत देश में अनेकों पर्यटन स्थल हैं और पर्यटन स्थल का एक अनुकूल मौसम भी होता है इसी प्रकार गंगासागर जाने का सबसे उचित मौसम जनवरी का महीना होता है क्योंकि मकरसक्रांति के दिन ही गंगासागर में स्नान का विशेष महत्व है। मकर सक्रांति आने से पहले ही यहाँ मेले की विशेष तैयारी होने लगती है। ये लोकप्रिय कहावत प्रचलित है :- सारे तीर्थ बार बार, गंगासागर एक बार।



     तो इसबार गंगासागर जाने वाले यात्रियों में हम भी शामिल थे। पिताजी ने अपना पास अबकी बार हावड़ा के लिए निकलवाया और मैंने उनके रेलवे पास पर जोधपुर-हावड़ा एक्सप्रेस में 1 जनवरी का रिजर्वेशन करवा लिया, परन्तु जब वक़्त आया तो जाने के लिए मैं और माँ ही तैयार थे, पिताजी, रश्मि और निधि का जाना कैंसिल हो गया। घने कोहरे में नई साल के पहले दिन मैं और माँ निकल लिए आज कलकत्ता की एक अनोखी यात्रा पर। आगरा कैंट से एक ऑटो लेकर हम आगरा फोर्ट स्टेशन पहुंचे, ट्रेन अपने निर्धारित समय से एक घंटा देरी से आई, ट्रेन में हमने अपनी सीट देखी, कुल पांच सीट में से दो सीट ही हम अधिग्रहित करपाए बाकी तीन सीट हमारी हावड़ा तक खाली ही गई। 

    ठीक अगली सुबह निर्धारित समय पर ट्रेन ने हमें हावड़ा पर उतार दिया, मैंने पहली बार हावड़ा स्टेशन देखा था, यह बहुत ही बड़ा टर्मिनल स्टेशन है और मेरे पिताजी का प्रिय स्टेशन है। मैं स्टेशन से बाहर आया यहाँ से हमें सियालदह स्टेशन पहुंचना था, पहलीबार हावड़ा ब्रिज पर यात्रा का करने का यह मेरा प्रिय अवसर था, हुगली नदी पार करने के बाद हम कलकत्ता शहर पहुंचे।

   हावड़ा और कलकत्ता दो जुड़वां शहर हैं जो हुगली नदी के दोनों किनारों पर स्थित हैं ऐसे ही दो शहर केरल में भी हैं कोचीन और एर्नाकुलम। कलकत्ता को देखकर मुझे अंग्रेजों का ज़माना याद आता है, जब सोलहसौ ईसवी में ईस्ट इंडिया कंपनी की भारत में स्थापना हुई थी तो अंग्रेजों ने कलकत्ता को ही भारत की प्रथम राजधानी बनाया था और यह काफी सालों तक राजधानी बनी रही, अंग्रेजों की हुकूमत की भारत में शुरुआत ही कलकत्ता शहर से हुई थी।

    यहाँ मुझे एक और ऐसी चीज़ देखने को मिली जो सम्पूर्ण भारत में अत्यंत कहीं नहीं है और वह है सड़क पर चलने वाली ट्रेन अर्थात ट्राम। यह भी भारत के लिए अंग्रेजों की ही देन थी। ट्राम में बैठकर मैं और माँ कालीघाट पहुंचे और माँ काली के दिव्य दर्शन किये,इसके पश्चात् हम कलकत्ता का चिड़ियाघर देखने पहुंचे। आज रविवार का दिन था और नई साल का दूसरा दिन दिन भी तो लाजमी है की भीड़ तो होगी ही।

    गंगासागर जाने के लिए सियालदह स्टेशन से लोकल शटल मिलती है, उस शटल को पकड़कर हम काकद्धीप स्टेशन पहुंचे और यहाँ से लट नंबर 6 पहुंचे, यहाँ से साढ़े छः रूपये प्रति सवारी के हिसाब से हमने पानी के जहाज के दो टिकट खरीदे और जहाज में सवार हो गए, कुछ ही देर बाद हम दुसरे द्धीप पर थे यहाँ से एक बस द्वारा हम इस द्धीप के दुसरे किनारे पहुँचे। यहाँ ही गंगासागर का प्रसिद्ध मंदिर स्थित है और सामने था अथाह सागर जिसका नाम था बंगाल की खाड़ी।
   
     हम भारतसेवा संघाश्रम पहुंचे और एक कमरा बुक किया। हम करीब तीन दिन तक यहाँ रहे और प्रतिदिन सुबह शाम समुद्र के किनारे घूमने जाते थे, दोपहर का खाना हमें संघ में ही मिल जाता था जिसके लिए पहले ही कूपन ले लेना होता था, एक दिन हम कूपन लेना भूल गए तो माँ ने आश्रम के महाराज जी से निवेदन किया  उन्होने हमें कूपन दिलवा दिया। कुछ दिन बाद हम वापस कलकत्ता लौट आये,  लौटने का हमारा रिजर्वेशन  सियालदह - अजमेर एक्सप्रेस में था जो उत्तर भारत में पड़ रहे घने कोहरे के कारण चौबीस से अड़तालीस घंटे देरी से चल रही थी। दो दिन सियालदह स्टेशन पर पड़े रहने के बाद आखिरकार हमारी ट्रेन आई और हम वापस अपने घर आगरा आये। 


* हावड़ा ब्रिज 


*काकद्धीप रेलवे स्टेशन 


गंगासागर में मेरी माँ 




* उपरोक्त फ़ोटो विषय की उपयोगिता हेतु गूगल से लिए गए हैं। 

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