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Monday, July 29, 2013

SHYONPUR FORT




श्योंपुर क़िला 
 सुधीर उपाध्याय की प्रस्तुति


       इस गर्मी के माह में भी मुझे बरसात की वजह से काफी ठण्ड का सामना करना पड़ा । श्योपुर स्टेशन से बाहर निकलकर मैंने और दीपक ने एक सिगड़ी के किनारे बैठकर चाय पी । यह काफी अच्छी और मसालेदार चाय थी जिसकी कीमत थी मात्र पाँच रुपये । स्टेशन के ही ठीक सामने एक सड़क जाती है, यह सड़क कुन्नु राष्ट्रीय पार्क की ओर जाती है जो यहाँ से अभी काफी दूर था । समयाभाव के कारण हम वहाँ तक नहीं जा सकते थे । फिर भी हमने एक ऑटो वाले को रोककर पूछा - हाँ भाई यहाँ देखने को क्या है ? वो हमारी बात सुनकर थोडा अचरज में पड़ गया और बोला कि आप श्योपुर घूमने आये हो ? हमने कहा कि हाँ । वो हमारी बात सुनकर काफी खुश हुआ और बोला कि काश आपकी तरह मुझे ऐसे ही रोज पर्यटक मिले तो हमारे साथ साथ इस जिले ( श्योपुर ) का भी नाम दुनिया में मशहूर हो जाए । 

सबसे पहले उस ऑटो वाले ने हमें श्योपुर की एक नदी के दर्शन कराये जो पथरीले रास्तो से बड़ी तीव्र गति से बहती हुई चली जा रही थी, बरसात की वजह से इस नदी का वेग देखने के लायक था, मैंने और दीपक ने काफी देर तक इस नदी को देखा । ऑटो वाले ने हमने नदी में नहाने के लिए पहले ही मना कर दिया था और वाकई उसने ठीक ही कहा था, इस नदी के वेग को देखकर ही इतना डर सा लग रहा था तो नहाने की तो उम्मीद ही क्या की जा सकती है । और फिर हम सुबह से काफी नहा चुके थे प्रकृति के मुफ्त फब्बारे में ।  

     नदी के ठीक दाई और श्योपुर जिले का कारागार था, ऑटो वाला हमें पहले ही नदी के किनारे छोड़ कर जा चुका था। अब हमारे एक तरफ जेल  थी और दूसरी तरफ नदी, पीछे की ऒर  रेलवे स्टेशन की  ओर  जाने वाला  रास्ता था जिस पर अभी हम ऑटो में बैठ कर आये थे और सामने था कुन्नु नेशनल पार्क का पहला दरवाजा, मतलब जंगलो की शुरुआत । 

     शाम हो चली थी, आज रात हमें श्योपुर में ही रुकना था, जिस ट्रेन से हम आये थे वो स्टेशन पर ही खड़ी थी
सुबह हमें इसी ट्रेन से ग्वालियर वापस लौटना था और अब हम चल दिए श्योपुर का इतिहास खोजने। मतलब श्योपुर किले की तरफ। हमने किले तक पहुँचने के लिए एक ऑटो किया और ऑटो वाले ने हमें श्योपुर के मुख्य चौराहे के बीच लाकर उतार दिया । यहाँ से एक रास्ता किले की तरफ जाता है । श्योपुर का किला शहर से एक मील दूर पहाड़ी पर बना हुआ है , इस किले के प्रवेशद्वार पर पहुंचकर मुझे ऐसा लगा जैसे साक्षात् मैं श्योपुर के महाराज से मिलने जा रहा हूँ, लेकिन अब ऐसा नहीं था, किले के अंदर काफी अच्छा खासा शहर बसा हुआ था । हम किले पर चढ़ते ही जा रहे और शाम भी ढलती ही जा रही थी । किले का इतिहास नीचे दिए गए एक फ़ोटो में आपको मिल जाएगा ।

      किले से लौटकर हमने श्योंपुर का बाजार घूमा, यह एक काफी बड़ा और अच्छा बाजार है, यही मेरी नजर एक सिनेमा हॉल पर पड़ी जिसका नाम था कृष्णा टाकीज। इसमें भाग मिल्का भाग मूवीज चल रही थी,चूँकि हमें आज श्योंपुर  में  काटनी थी सो रात बारह बजे तक समय काटने के लिए इससे अच्छी जगह  हो ही नहीं सकती थी, हमने पहले एक होटल में खाना खाया, यहाँ अन्य जगहों कि तुलना में खाना काफी सस्ता और अच्छा था और उसके बाद हम सिनेमा में घुस गए, अभी इसमे पिछले शो का एंड चल रहा था , अर्थात हमने भाग मिल्का भाग मूवीज का एंड पहले देखा और शुरुआत बाद में ।

     मूवीज ख़त्म होने के बाद हम श्योपुर कि सड़कों पर भटकते हुए नजर आये, मतलब हम रेलवे स्टेशन का रास्ता भूल गए , शहर में एकदम सन्नाटा था, हमें कोई  नहीं  हम यह  स्टेशन कहाँ है ? लेकिन कड़ी मशक्कत के बाद आखिर हमें पुलिस की एक जीप दिखाई दी जो रात्रि के समय श्योंपुर शहर कि गश्त पर थी, पुलिस वालों ने हमें स्टेशन के रास्ते पर उतार दिया और हम स्टेशन पहुंचे । ट्रैन सामने ही खड़ी  हुई थी, मैं और दीपक ट्रैन में ही बिस्तर लगाकर सो गए।
        आइये अब नीचे श्योपुर देखते हैं । 

श्योंपुर कलां के दर्शनीय स्थल 

  • कुन्नु राष्ट्रीय पार्क 
  • कुन्नु की घाटियां 
  • श्योपुर किला 
  • श्री राम मंदिर 
  • कुन्नु नदी 

नदी का वेग , श्योपुर की  एक नदी 





श्योंपुर  जिला कारागार 

कुन्नु के जंगलों की  तरफ जाता रास्ता  

किले का प्रथम द्वार 



श्योपुर किला 




SHEOPUR FORT ON BANK OG CHAMBAL RIVER

CHAMBAL RIVER, NEAR SHEOPUR FORT

SHEOPUR FORT

SHEOPUR FORT

SHEOPUR FORT 

CHAMBAL RIVER, SHEOPUR

SHEOPUR FORT

SHEOPUR FORT

किले के अंदर महात्मा बुद्ध का एक मंदिर 

SHEOPUR FORT

HISTORY OF SHEOPUR FORT

SHEOPUR FORT

SHEOPUR

SHEOPUR CITY

SHEOPUR RAILWAY STATION

रात्रि के समय श्योपुर रेलवे स्टेशन 

SHEOPUR RAILWAY STATION

SHEOPUR RAILWAY STATION



SHEOPUR RAILWAY STATION

SHYONPUR KALAN




कुन्नु घाटी की एक रेल यात्रा  - श्योंपुर कलां की ओर 

कुन्नु घाटियों का असली नजारा सबलगढ़ के निकलने के बाद ही शुरू होता है।  ट्रेन रामपहाड़ी, बिजयपुर रोड,कैमारा कलां होते हुए बीरपुर पहुंची। सबलगढ़ के बाद अगला मुख्य स्टेशन यही है, यहाँ आने से पहले ही  हो गया था, मतलब आसमान में घने काले बादलों की काली घटाएँ छाई हुईं थीं। ट्रेन की छत पर से बादल ऐसे नजर आ रहे थे जैसेकि अभी  बरस पड़ेंगे, पर शायद आज बादलों को पता था कि मैं ट्रेन की छत पर और भीगने के सिवाय मुझपर कोई रास्ता ही नहीं बचेगा इसलिए आसमान में गरजते ही रहे। ट्रेन बीरपुर स्टेशन पहुंची, अब बादलों का धैर्य जबाब दे गया था, ट्रेन के स्टेशन पहुँचते ही बरस पड़े, मैं स्टेशन के टीन शैड के नीचे होकर केले  खाता रहा, यहाँ केले आगरा की अपेक्षा काफी सस्ते थे और मुझे भूख भी काफी लगी हुई थी, दीपक भी मेरे साथ था। 

आज बीरपुर में जो बारिश मैंने देखी वो पहले कभी नहीं देखी थी, एक पल को तो  जैसे आसमान ही आज धरती पर आ गिरा था। केले ख़त्म हुए तो मैं अब बारिश बंद होने की प्रतीक्षा करने लगा, पर मैं भूल गया था कि सामने खड़ी ट्रेन किसी की प्रतीक्षा नहीं करती, बस वह तो वक़्त की पाबन्द है जहाँ वक़्त हुआ नहीं और वो आगे बढ़ी नहीं । घमासान बारिश के बीच ट्रेन ने अपनी सीटी बजा दी और एक जोरदार झटका सा लेकर ट्रेन बीरपुर से रवाना हो चली। अब ट्रेन की छत भी लगभग खाली सी हो चुकी थी, बस एक दो मुसाफिर ही अपने छातों का सहारा लेकर छत पर बैठे हुए थे । यहाँ से मैं और दीपक अलग अलग डिब्बों में सवार हो गए। 

मेरे ट्रेन के अन्दर घुसने के लिए जगह ही नहीं बची थी इसलिए मैं दरवाजे पर ही लटका रहा। अन्दर खड़ी हुई सवारियों ने मुझे और आराम से खड़े होने के लिए जगह दे दी वो भी सिर्फ इसलिए ताकि बरसात के पानी की फुहारें मेरी वजह से उनतक नहीं पहुँच सकें । मैं दरवाजे पर लटका लटका भी काफी हद तक भीग चुका था और बरसात का पानी ट्रेन की छत से बह कर सीधे मेरे ऊपर ही गिर रहा था, हालाँकि यह मेरे स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं था फिर भी मुझे खुशी इस बात की थी कि आज मैं दूसरों के लिए काम आ गया, मेरी वजह से ट्रेन के अन्दर के यात्री बरसात के पानी में भीगने से सुरक्षित थे और मेरा धन्यवाद भी कर रहे थे । 

अब कुन्नु की घाटियाँ शुरू हो चुकीं थीं, यह देखने में बिल्कुल चम्बल की घाटियों की तरह ही थी और हों भी क्यों न आखिर ट्रेन चम्बल नदी के किनारे के भाग से ही होकर जो गुजर रही थी। तभी रास्ते में कुन्नु नदी का पुल आया, यह चम्बल की सहायक नदी है और इसमें भी मैंने कई सारे घड़ियाल बरसात में मटरगस्ती करते हुए देखे । आज बरसात अपने पूरे जोरों पर थी, ट्रेन की पटरियां अब दिखना बंद हो चुकी थी, दरवाजे से बाहर झाँकने पर ऐसा लग रहा था, जैसे ट्रेन पटरियों पर नहीं किसी नदी नाले में बहकर जा रही है, कुन्नु की घाटियों की रेतीली मिटटी बह बह कर मेरे पैरों के नीचे से जा रही थी, ट्रेन की स्पीड मात्र दस किमी प्रघ थी । ट्रेन सिल्लिपुर होते हुए इकडोरी पहुंची। बीरपुर के बाद अगला मुख्य स्टेशन । यहाँ गरमागरम चाय पीने को मिल गई, और अब बरसात भी लगभग हलकी हो चली थी। 

ट्रेन टर्रा कलां, सिरोनी रोड होते हुए खोजीपुरा पहुंची। यह इकडोरी के बाद अगला मुख्य स्टेशन है, यहाँ ट्रेन काफी देर खड़ी रही, मैंने और दीपक ने जब तक दो दो चाय और पी लीं, मेरे कपड़े पूरी तरह से भीग चुके थे और मैं सर्दी से बुरी तरह काँप रहा था, खोजीपुरा की चाय ने मुझे कुछ हद तक आराम पहुँचाया। यहाँ श्योंपुर से सबलगढ़ जाने वाली ट्रेन का क्रॉस हुआ और इसके बाद यह ट्रेन रवाना हो चली ।

 खोजीपुरा के बाद अगला स्टेशन दुर्गापुरी था । यह रेल लाइन का बहुत ही शानदार और छोटा स्टेशन है, स्टेशन पर एक बहुत बड़ा दुर्गा माता का मंदिर बना हुआ है और पास में ही एक छोटा सा सुनहरा और पूर्ण प्राक्रतिक गाँव भी है जिसका नाम है दुर्गापुरी । ट्रेन की सवारियां ट्रेन से उतरकर सीधे मंदिर की ओर भागी और दर्शन करके वापस अपने स्थान पर आकर बैठ गईं । ट्रेन भी यहाँ दर्शन हेतु करीब पांच से सात मिनट तक खड़ी रही। यहाँ से मैं और दीपक ट्रेन की छत पर आ गए और छत पर ही मैंने अपने कपडे भी चेंज कर लिए ।

दुर्गापुरी से आगे अगला स्टेशन आया गिरधरपुर । यहाँ रेलवे लाइन के किनारे सब्जी मंडी लगी हुई थी, मतलब शाम हो चली थी और गाँव के लोग इसवक्त रेलवे स्टेशन पर आकर सब्जी की खरीदारी करते हैं ।दीपक को यह जगह काफी  पसंद आई । इसके बाद दंतारा कलां स्टेशन आया,  यहां मैं ट्रेन की छत से नीचे उतर आया और टॉयलेट से निर्वृत होकर जैसे ही ट्रेन की छत पर चढने लगा ट्रेन स्टेशन से रवाना हो चली । मैं बीच में ही लटका रह गया । आज पहली बार मैंने कपलिंग पर खड़े होकर यात्रा की और कपलिंग पर हो खड़े खड़े मैं श्योंपुर पहुँच गया जो इस रेल लाइन का आखिरी स्टेशन था ।

रामपहाड़ी  रेलवे स्टेशन 

बिजयपुर रोड रेलवे स्टेशन 




भारतीय रेल का एक  सफ़र 







कैमारा कलां रेलवे स्टेशन 



मौसम का प्रकोप 



बारिश के पानी में डूबा हुआ एक सड़क का पुल 

बीरपुर स्टेशन पर 

दीपक उपाध्याय 



इतवारी रेलवे स्टेशन पर 

एक ईमारत 

खोजीपुरा रेलवे स्टेशन 


दुर्गामाता का मंदिर 

दुर्गापुरी रेलवे स्टेशन 

कुन्नु वैली रेलवे का एक सिग्नल 


गिरधरपुर रेलवे स्टेशन 

गिरधरपुर स्टेशन पर लगी सब्जीमंडी 



रास्ते में एक नहर 

श्योंपुर रेलवे यार्ड 

श्योपुर कलां रेलवे स्टेशन 

   
कुन्नु घाटी की अन्य यात्रायें