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Monday, July 23, 2018

MT. ABU


आबू पर्वत की एक सैर

     महीना मानसून का चल रहा था और ऐसा शायद ही कभी हुआ हो कि मानसून आ चुका हो और हम यात्रा पर ना निकलें हों। जुलाई के इस पहले मानसून में मैंने राजस्थान के सबसे बड़े और ऊँचे पर्वत, आबू की सैर करने का मन बनाया। इस यात्रा में अपने सहयात्री के रूप में कुमार को फिर से अपने साथ लिया और आगरा से अहमदाबाद जाने वाली ट्रेन में दोनों तरफ से मतलब आने और जाने का टिकट भी बुक करा लिया। 23 जुलाई को कुमार आगरा फोर्ट से ट्रेन में बैठा और मैं अपनी बाइक लेकर भरतपुर पहुंचा और वहीँ से मैं भी इस ट्रेन में सवार हो लिया और हम दोनों आबू पर्वत की तरफ निकल पड़े।

     सुबह 9 बजे करीब ट्रेन ने हमें आबू पर्वत के नजदीकी स्टेशन आबू रोड पर उतार दिया। कुमार के पास फर्स्ट क्लास का पास था इसलिए वो वातानुकूलित प्रतीक्षालय में मुझे ले गया। ये बहुत बड़ा और काफी शानदार था। यहाँ आबू पर्वत और उसके आस पास  दर्शनीय स्थलों की बड़ी बड़ी तस्वीरें लगी हुई थी।  तस्वीरों में मुझे अचलगढ़ की तस्वीर काफी पसंद आई। इस प्रतीक्षालय में दो भाग हैं दोनों एक समान।  हम यहीं नहाधोकर तैयार हुए बाहर निकले। कुमार चाय पीना चाहता था पर एक दुकान पर नाश्ता किया।  यह नाश्ता बरगद के जैसे दिखने वाले पत्ते के दोने में समोसे और कचौड़ी की मेलजोल से बना बहुत ही स्वादिष्ट था।     

     नाश्ता करने के बाद हम बस स्टैंड की तरफ बढ़ चले, हालाँकि बस स्टैंड रेलवे स्टेशन से थोड़ी ही दूरी पर है पर हमें दूरी पता न होने के कारण एक ऑटो में बैठ गए और वो हमसे 500 मीटर की दूरी के 10 -10  रूपये ले उड़ा। आबू पर्वत यहाँ से करीब 20 किमी दूर है। राजस्थान की एक रोडवेज यहाँ से आबू पर्वत जाने के लिए तैयार खड़ी हुई थी। हमने उक्त बस का टिकट लिया और अपनी सीट पर बैठ गए।

      शानदार हरियाली के बीच अब बस ने गोल गोल पहाड़ चढ़ना आरम्भ कर दिया था। आबू पर्वत की श्रृंखला देखते ही बनती है। जब बस कुछ और ऊंचाई पर पहुंची तो हम भूल ही गए थे कि हम राजस्थान में है, हमें ऐसा आभास हो रहा था कि हम हिमालय की वादियों में आ चुके हैं। इन ऊँचे ऊँचे और हरे भरे पहाड़ों को देखकर कोई कह ही नहीं सकता कि इतने ऊँचे पहाड़ भी 'अरावली' का भाग हो सकते हैं, मानसून की इस यात्रा में इन पहाड़ों की सैर करना अपने आप में एक अलग ही रोमांच पैदा कर देता है। रास्ते के नज़ारे बेहद ही सुन्दर थे, जब हम  ऊंचाई पर पहुंचे तो मेरे कानों ने काम करना बंद कर दिया। मेरे साथ ऐसा ही होता है जब भी कहीं ऊंचाई वाले स्थानों पर जाता हूँ मेरे कान बुढुर बुढुर करने लगते हैं।

       कुछ देर बाद हम आबू पर्वत पर पहुँच चुके थे, चारों तरफ कोहरे का साम्राज्य था। बस ने हमें अपने स्टैंड पर उतार दिया। बस स्टैंड पर लगी समय सारिणी में मैंने देखा आखिरी बस शाम को सात बजे है यानी सात बजे तक हम आबू पर्वत घूम सकते हैं उसके बाद हमें वापस लौटना ही होगा। मैंने सुना था यहाँ बाइक रेंट पर मिल जाती हैं हमने भी एक स्पलेंडर बाइक रेंट पर ले ली 250 /- प्रतिदिन के हिसाब से और इसमें दोसौ का पेट्रोल भरवा लिया और हम निकल गये आबू पर्वत के उन स्थानों की ओर, जो इस पर्वत की विशेषता को महत्वपूर्ण बनाते हैं।

1 - नक्की झील

      आबू पर्वत में स्थित नक्की झील यहाँ का मुख्य आकर्षण है। यह मीठे पानी की राजस्थान की सबसे ऊँची झील है। ऐसा माना जाता है कि देवताओं ने अपने नाखूनों से खोदकर इस झील का निर्माण किया था इसलिए इस झील को नक्की झील कहा जाता है। इसके किनारे पर स्थित भारत माता का मंदिर काफी भव्य और शोभनीय है। इस झील का आकर बहुत बड़ा होने के साथ साथ गहरा भी है। इसमें स्नान करना पूर्णतः वर्जित है। झील में रंग बिरंगी मछलियां भी देखने योग्य हैं। इसके एक किनारे पर पानी के जहाज के आकर में बना हुआ एक रेस्टोरेंट भी स्थित है।


नक्की झील और भारत माता का मंदिर 

मेरा मित्र और सहयात्री ''कुमार भाटिया'' 


नक्की झील 

नक्की झील की मछलियां 

झील का एक शानदार दृश्य 
















2  - चंपा गुफा और टॉड रॉक
     नक्की झील से ही एक रास्ता घंटाघर होते हुए टॉड रॉक की तरफ जाता है यह मेंढक के आकर की पत्थर की विशाल शिला है जिसकी छवि देखते ही बनती है परन्तु इस तक पहुंचने से पहले हमें अपनी बाइक एक स्थान पर खड़ी  करनी पड़ी।  सबसे पहले हमने  पर्वत के क्लॉक टॉवर के कुछ फोटो लिए और इसके बाद हम पहाड़ को चढ़ते हुए चंपा गुफा पहुंचे।  यहाँ एक हनुमान जी का प्राचीन मंदिर है और इसके नजदीक ही चंपा गुफा है जहाँ रहकर स्वामी विवेकानंद जी कुछ समय तक तपस्या की थी या ध्यान मग्न रहे थे।






















CLOCK TOWER OF MOUNT ABU



दिलवाड़ा के जैन मंदिर
       
      टोडरॉक से लौटने के बाद हम मुख्य बाजार पहुंचे, यहाँ राजस्थान में खाना बाँटने वाली अन्नपूर्णा वैन खड़ी हुई थी, आज भी यहाँ मात्र 8 रूपये में थाली लेकर हमने भोजन किया। 20 रूपये की कोक और 8 रूपये की थाली सचमुच खाना खाकर आनंद आ गया। इससे पहले भी मैं पिछली साल अपनी जयपुर यात्रा के समय ऐसी ही वैन से खाना लेकर खा चुका था। बाइक लेकर जब हम अचलगढ़ की ओर जा रहे थे तो रास्ते में दिलवाड़ा के जैन मंदिर भी पड़े।आबू पर्वत पर स्थित दिलवाड़ा के जैन मंदिर विश्व विख्यात हैं। हजारों की संख्या में लोग इन्हें देखने के लिए दूर दूर से प्रतिदिन यहाँ आते हैं। जैन धर्म के लोगों के लिए इनका विशेष महत्त्व है। हम इन्हें नहीं देख पाए क्योंकि यहाँ एक तो कैमरा और मोबाइल ले जाना वर्जित है और दूसरी तरफ लम्बी लाइन भी लगी हुई थी।  जहाँ हमारा कैमरा नहीं जाता वहां हम भी नहीं जाते।









 माँ अर्बुदादेवी शक्तिपीठ धाम

       हम अचलगढ़ की ओर  बढ़ रहे थे यहाँ एक शक्तिपीठ धाम भी स्थित है जो माँ अर्बुदा देवी के नाम से प्रसिद्द है। जब रास्ते में इनका विशाल द्धार देखा तो सोचा पहले इनके दर्शन किये जाएँ तभी आगे बढ़ा जाये।  आबू पर्वत को कोहरे ने पूर्णतः अपने ागढ़ में कर लिया था चारो तरफ सिर्फ कोहरे की चादर सी ही तनी हुई दिखाई दे रही थी। हम बाइक को बाहर खड़ी कर माँ अर्बुदा देवी के दर्शन के लिए बनी हुई सीढ़ियों पर चढ़ते ही जा रहे थे। शानदार प्राकतिक स्थल होने के साथ साथ मौसम ने इस स्थान को और भी रोमांचक बना दिया था।  काफी सीढ़ियां चढ़ने के बाद हम माँ अर्बुदा सेवी के दरबार में पहुंचे।  पहाड़ों के तलहटी के अंदर एक चट्टान के नीचे देवी माँ की सुनहरी मूर्ति दर्शनीय है। कुछ देर हम देवी माँ की मूर्ति के सामने ध्यान मग्न रहे।  हमारी सारी थकान अब दूर हो चुकी थी।  दर्शन करने के पश्चात् हम गर्भगृह से बाहर आ गए और वापस अपनी अगली मंजिल की तरफ रवाना हो चले।














 अचलगढ़ किला

     अचलगढ़ का किला महाराणा कुम्भा ने बनबाया था। आज यह पूरी तरह से क्षतिग्रस्त है। जब हम इस किले के पास पहुंचे तो अचलेश्वर महादेव के दर्शन करना ही भूल गए जबकि रानियों के कुल देवता के रूप में आज भी अचलगढ़ के प्रवेश द्धार पर विराजमान हैं।  हमने अपनी बाइक बाहर खड़ी की और किले की सीढ़ियों को चढ़ना आरम्भ किया। शुरुआत में यहाँ अचलगढ़ के जैन मंदिर देखने को मिलते हैं इसके बाद एक रेडिओ स्टेशन भी यहाँ स्थित है जिसमे पुराने समय के गाने तेज आवाज में हमें सुनाई दे रहे थे। जब हम किले को चढ़ने में थक गए तो किले के अंदर स्थित चामुंडा माता मंदिर के पुजारी जी यहाँ से गुजरे और हमें देखकर बोले बस इतने में ही थक गए मैं तो रो तीन चार चक्कर इस किले के ऊपर से नीचे और नीचे से ऊपर चढ़ता हूँ।  तुम तो नौजवान हो और मैं बूढा भी हो चला हूँ।  दरअसल सब रहने और खाने का असर है वो बाबा प्रदुषण से मुक्त और शहरीय जनजीवन से दूर इस प्राकृतिक वातावरण में रहते हैं और हम मिलावटी चीजें खाने वाले शहरों में, फर्क तो होगा ही। हमें वैसे भी अकेले ऊपर जाने में दर सा भी लग रहा था बाबा के संग हो जाने से हमें थोड़ी हिम्मत सी मिली और हम किले तरफ बढ़ चले। किले में प्रवेश करते  पहले मीराबाई का मंदिर देखने को मिलता है।  इसके बर्बर में बहुत बड़ी खाई है जो हमेशा  जल से भरी रहती है।  जंगली जीव जंतु इसके घाटों पर पानी पीने आते हैं।  बाबा ने बताया की इसका निर्माण राणा ने ही कराया था यह अत्यंत ही गहरी है।  कोहरे की वजह से इसके  हम नहीं कर पाए थे। चामुंडा देवी का मंदिर यहाँ दर्शनीय है बाबा अपनी कोठरी में चले गए और हम बाकी किले के अवयवों को ढूंढने में लग गए। किले की दीवार के पीछे एक काली माता का मंदिर भी पड़ता है जहाँ तक शहीद ही कोई जाता हो पर हमने हिम्मत जुताई और हम उनके दर्शन करने पहुंचे। हालांकि शुरुआत में कुमार को काफी दर सा भी लग रहा था पर मैं ही नहीं माना।  इस मंदिर के सामने दिखाई देने वाला नजारा अत्यंत ही भयावह था। यहाँ से हमें एहसास हुआ कि  यह किला अत्यंत ही ऊँची पहाड़ी पर बना हुआ था।





























गुरु दत्तात्रेय मंदिर, गुरु शिखर। 
     अचलगढ़ से लौटने के बाद शाम करीब हो चली थी। चारों तरफ केवल कोहरे की धुंध छाई हुई थी। अपना अगला और आखरी पड़ाव था गुरु शिखर,  जो आबू पर्वत की सबसे ऊँची चोटी कहलाती है। गोल घुमावदार रास्तों से होते हुए गुरु शिखर पहुंचे, यह वास्तव में राजस्थान का सर्वोच्च ऊँचा शिखर है। यहाँ भगवान दत्तात्रेय का विशाल मंदिर है। भगवान दत्तात्रेय तीनों त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु और महेश के अवतार माने जाते हैं। महर्षि अत्रि जी की पत्नी देवी अनुसुइया ने तीनों त्रिदेवों को अपना बालक बना दिया था वही बालक आगे चलकर महान गुरु दत्तात्रेय के नाम से विख्यात हुए। 

    गुरुदेव के दर्शन कर हम वापस अब बस स्टैंड की तरफ रवाना हो लिए। यहाँ से लौटने पर मुझे सर्दी बहुत अधिक लगने लगी, दाँतों के साथ साथ पूरा शरीर अब ऐसे कँपकँपाने लगा था जैसे हम जुलाई के माह से निकलकर जनवरी के माह में आ गए हों। एक स्थान पर आकर मैंने रम के दो घूँट मारे और सर्दी के साथ साथ पूरे  थकान भी फुर्र हो गई। बाइक में भी अब पहले की अपेक्षा दुगना पिकअप बढ़ गया था। सात बजने से पहले हमने बाइक जमा की और बस स्टैंड पहुंचकर अपनी बस पकड़ी। 









   
घर की वापसी 

हम शाम को जैसे ही बस स्टैंड पर पहुंचे बस चलने को तैयार खड़ी हुई थी। हमने किराये की बाइक उसके मालिक को वापस की और अपना ड्राइविंग लाइसेंस वापस लेकर तुरंत बस में सीट पर आ बैठा। करीब एक घंटे बाद हम स्टेशन पहुँच गए। ट्रेन  के आने में अभी वक़्त था इसलिए हम स्टेशन के बाहर स्थित बाजार में एक ढ़ाबे  खाना खाया और उसके बाद सीधे स्टेशन पहुंचे। हमारी ट्रेन अभी मेहसाणा पहुंची ही थी कि पता चला कि आगे एक मालगाड़ी का डिरेलमेंट हो गया है इसलिए उसे डाइवर्ट करके निकला जा रहा है। हम काफी परेशान हो गए,इस वक़्त हम घर से बहुत दूर थे और वापसी एक मात्र साधन यह ट्रैन ही थी जो अब नहीं आ रही थी। 

मैं सुबह से घूमने फिरने के कारण बहुत थक गया था और मुझे अब नींद भी बहुत जोर से आ रही थी। आबू रोड स्टेशन पर इस वक़्त केवल एक ही ट्रेन बची  हुई थी और वो थी बीकानेर से बांद्रा जाने वाली रणकपुर एक्सप्रेस। जो अब अजमेर के रास्ते चित्तौड़गढ़ होते हुए जायेगी।  हमने बिना देर किये इस ट्रेन में अपने लिए सीटें खोजी और अगली सुबह अजमेर पहुँच गए। अजमेर से आगरा फोर्ट जाने वाली इंटरसिटी चलने के लिए तैयार खड़ी हुई थी जिससे हम वापस अपने अपने घर लौटे। 

धन्यवाद