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Monday, September 25, 2017

WAIR FORT


 DATE :- 16 JULY 2016

ऊषा मंदिर और वैर फोर्ट 

यात्रा एक साल पुरानी है परन्तु पब्लिश होने में एक साल लग गई, इसका एक अहम् कारण था इस यात्रा के फोटोग्राफ का गुम हो जाना परन्तु भला हो फेसबुक वालों का जिन्होंने मूमेंट एप्प  बनाया और उसी से मुझे मेरी एक साल पुरानी राजस्थान की मानसूनी यात्रा के फोटो प्राप्त हो सके। यह यात्रा मैंने अपनी बाइक से बरसात में अकेले ही की थी। मैं मथुरा से भरतपुर पहुंचा जहाँ पहली बार मैंने केवलादेव घाना पक्षी विहार देखा परन्तु केवल बाहर से ही क्योंकि इसबार मेरा लक्ष्य कुछ और ही था और मुझे हर हाल में अपनी मंजिल तक पहुंचना ही था , मेरे पास केवल आज का ही समय था शाम तक मुझे मथुरा वापस भी लौटना था।

Sunday, July 30, 2017

BHANGARH




भानगढ़ - प्रसिद्ध हॉन्टेड पैलेस 

     अजबगढ़ से निकलते ही शाम हो चली थी, घडी इसवक्त चार बजा रही थी और अभी भी हम भानगढ़ किले से काफी दूर थे।  सुना है इस किले में सूर्योदय से पहले और सूर्यास्त के पश्चात प्रवेश करना वर्जित है। अर्थात हमें यह किला दो घंटे के अंदर घूमकर वापस लौटना था। मैंने सोचा था कि भानगढ़ किला भी अजबगढ़ की तरह वीरान और डरावना सा प्रतीत होता होगा परन्तु जब यहाँ आकर देखा तो पता चला कि इस किले को देखने वाले हम ही अकेले नहीं थे, आज रविवार था और दूर दूर से लोग यहाँ इस किले को देखने आये हुए थे। किले तक पहुँचने वाले रास्ते पर इतना जाम था कि लग रहा था कि हम किसी किले की तरफ नहीं बल्कि किसी बिजी रास्ते पर हों।

AJABGARH FORT




अजबगढ़ की ओर 

       नारायणी मंदिर से निकलते ही मौसम काफी सुहावना हो चला था। आसमान में बादलों की काली घटायें छाई हुईं थीं। बादल इसकदर पहाड़ों को थक लेते थे कि उन्हें देखने से ऐसा लगा रहा था जैसे हम अरावली की वादियों में नहीं बल्कि हिमालय की वादियों में आ गए हों। घुमावदार पहाड़ी रास्तों पर बाइक अपने पूरे वेग से दौड़ रही थी, यहाँ से आगे एक चौराहा मिला जहाँ से एक रास्ता भानगढ़ किले की तरफ जाता है और सामने की ओर सीधे अजबगढ़,  जो यहाँ से अभी आठ किमी दूर था।

NARAYANI DHAM




नारायणी माता मंदिर - नारायणी धाम

    टहला से अजबगढ़ जाते समय हम एक ऐसे स्थान पर आकर रुके जहाँ चारों और घने पीपल के वृक्ष थे, यह एक चौराहा था जहाँ से एक रास्ता नारायणी माता के मंदिर के लिए जाता है जो यहाँ से कुछ ही किमी दूर है। हमने सोचा जब ट्रिप पर निकले ही हैं तो क्यों ना माता के दर्शन कर लिए जाएँ और यही सोचकर हम नारायणी धाम की तरफ रवाना हो गए। यहाँ अधिकतर लोग लोकल राजस्थानी ही थे और इन लोगों में नारायणी माता की बड़ी मान्यता है। आज यहाँ मेला लगा हुआ था, काफी भीड़ भी थी और तरह तरह की दुकाने भी लगी हुईं थी।

TAHALA FORT



टहला किला का एक दृशय 

कुम्हेर का किला देखने के बाद हमने मोबाइल में आगे का रास्ता देखा, इस वक़्त हम भरतपुर से डीग स्टेट हाईवे पर खड़े थे, यहाँ से कुछ आगे एक रास्ता सिनसिनी,  जनूथर होते हुए सीधे नगर को जाता है, जोकि शॉर्टकट है अन्यथा हाईवे द्वारा डीग होकर नगर जाना पड़ता, जो की लम्बा रास्ता है। हम सिनसिनी की तरफ रवाना हो लिए और जनूथर पहुंचे, जनूथर से नगर २२ किमी है। नगर पहुंचकर हम बस स्टैंड पर जाकर रुक गए। यहाँ हमने गर्मागरम जलेबा खाये।

KUMHER FORT



कुबेर नगरी - कुम्हेर 


       अबकी बार मानसून इतनी जल्दी आ गया कि पता ही नहीं चला, पिछले मानसून में जब राजस्थान में बयाना और वैर की मानसून की यात्रा पर गया था, और उसके बाद मुंबई की यात्रा पर, ऐसा लगता है जैसे कल की ही बात हो। वक़्त का कुछ पता नहीं चलता, जब जिंदगी सुखमय हो तो जल्दी बीत जाता है और गर दिन दुखमय हों तो यही वक़्त कटे नहीं कटता है। खैर अब जो भी हो साल बीत चुका है और फिर मानसून आ गया है, और मानसून को देखकर मेरा मन राजस्थान जाने के लिए व्याकुल हो उठता है। इसलिए अबकी बार भानगढ़ किले की ओर अपना रुख है, उदय के साथ एक बार फिर बाइक यात्रा।

        आज रविवार था, मैं और उदय कंपनी से छुट्टी लेकर सुबह ही मथुरा से राजस्थान की तरफ निकल लिए और सौंख होते हुए सीधे राजस्थान में कुबेर नगरी कुम्हेर पहुंचे। यह मथुरा से 40 किमी दूर भरतपुर जिले में है। कहा जाता है कि यह नगरी देवताओं में धन के देवता कुबेर ने बसाई थी, वही कुबेर जो रावण के सौतेले भाई थे। यहाँ एक विशाल किला है जो नगर में घुसते ही दूर से दिखाई देता है। भानगढ़ की तरफ जाते हुए सबसे पहले हम इसी किले को देखने के लिए गए। किले के मुख्य रास्ते से न होकर हम इसके पीछे वाले रास्ते से किले तक पहुंचे जहाँ हमे एक जल महल भी देखने को मिला।

Sunday, March 26, 2017

JODHPUR


मेहरान गढ़ की ओर

        शाम को पांच बजे तक सिंधी कैंप बस स्टैंड आ गया यहाँ से गोपाल ने एक डीलक्स बस में मेरी टिकट ऑनलाइन करवा दी थी जिसके चलने का समय शाम सात बजे का था, काफी पैदल चलने की वजह से मैं काफी थक चुका था इसलिए बस में जाकर अपनी सीट देखी,  यह स्लीपर कोच बस थी मेरी ऊपर वाली सीट थी उसी पर जाकर लेट गया | ट्रेन की अपेक्षा बस मे ऊपर वाली सीट मुझे ज्यादा पसंद है क्यूंकि बस की ऊपर वाली सीट में खिड़की होती है |
         मैंने गोपाल को फोनकर बस के जोधपुर पहुंचने का टाइम पुछा उसने बताया रात को २बजे | उसी हिसाब से अलार्म लगाकर मैं सो गया और फिर ऐसी नींद आयी की सीधे बाड़मेर से सत्तर किमी आगे डोरीमन्ना में जाकर खुली, जोधपुर और बाड़मेर कबके निकल चुके थे मैंने बस वाले से पुछा भाई हम कहाँ हैं मुझे तो जोधपुर उतरना था तुमने जगाया क्यों नहीं | वह मेरी तरफ ऐसा देख रहा था जैसे मैंने को महान काम कर दिया हो, | उसने मुझसे कहा की आधा घंटा और सोते रहते तो पाकिस्तान पहुँच जाते |

JAIPUR

आमेर किले की ओर 

     मुंबई से लौटे हुए अब काफी समय हो चुका था इसलिए अब मन नई यात्राओं की तैयारी कर रहा था बस जगह नहीं मिल रही थी, यूँ तो कुछ दिन बाद द्धारका यात्रा का प्लान तैयार था परन्तु उसमे अभी काफी समय था, मन बस अभी जाना चाहता था और ऐसी जगह जहाँ कुछ देखा न हो | काफी सोचने के बाद मुझे मेरे भाई गोपाल की याद आई जो इन दिनों जोधपुर में था, गर्मी के इस मौसम में रेगिस्तान की यात्रा ......... मजबूरी है।

शाम को घर जाकर जोधपुर हावड़ा एक्सप्रेस में रिजर्वेशन करवाया और यात्रा शुरू।  शाम को मेवाड़ एक्सप्रेस पकड़कर भरतपुर पहुँच गया और ट्रैन का इंतज़ार करने लगा। यूँ तो

Sunday, September 8, 2013

MUNABAO



बाड़मेर की तरफ़ 


      आज मैंने पहली बार सूर्य नगरी में कदम रखा था। मैं जोधपुर स्टेशन पर आज पहली बार आया था,  यहाँ अत्यधिक भीड़ थी. कारण था बाबा रामदेव का मेला, जो जोधपुर - जैसलमेर रेलमार्ग के रामदेवरा नामक स्टेशन के पास चल रहा था । मैंने इंटरनेट के जरिये यहाँ से जैसलमेर के लिए रिज़र्वेशन करवा लिया था किन्तु वेटिंग में, अब पता करना था कि टिकट कन्फर्म हुई या नहीं। मैंने पूछताछ केंद्र पर जाकर पुछा तो पता चला कि टिकिट रद्द हो गई थी, मेरा चार्ट में नाम नहीं था।

मैं स्टेशन के बाहर आया और यहाँ के एक ढाबे पर खाना खाया। यहाँ मैंने देखा कि सड़क पर दोनों तरफ चारपाइयाँ ही चारपाइयाँ बिछी हुई हैं बाकायदा बिस्तर लगी हुई। किराया था एक रात का मात्र 40 रुपये ।
परन्तु इसबार मेरा सोने का कोई इरादा न था मुझे बाड़मेर पैसेंजर पकड़नी थी जो रात 11 बजे चलकर सुबह 5 बजे बाड़मेर पहुंचा देती है । इसप्रकार मैं बाड़मेर भी पहुँच जाऊँगा और रात भी कट जाएगी।मैंने ऐसा ही किया।

बाड़मेर पैसेंजर से मैं सुबह पांच बजे ही बाड़मेर पहुँच गया, स्टेशन पर बने वेटिंग रूम में नित्यक्रिया से फुर्सत  होकर बाहर गया और एक राजस्थानी बाबा की दुकान पर दस रुपये वाली बाड़मेरी चाय पीकर आया। सुबह साढ़े सात बजे मुनाबाब लिए यहाँ से पैसेंजर जाती है,  मुनाबाब जाने के लिए ट्रेन  स्टेशन पर तैयार खड़ी थी, तभी मैंने देखा कि  मुनाबाब की ओर जाने वाली दूसरी लाइन के सिग्नल हरे हो रहे हैं, मतलब पैसेंजर से पहले कोई और ट्रेन  मुनाबाब की और जाने वाली थी जिसका स्टॉप बाड़मेर स्टेशन पर नहीं था, और जब ट्रेन हमारे सामने से गुजरी तो पता चला कि यह थार एक्सप्रेस थी जो कि पाकिस्तान वाले यात्रियों को लेकर मुनाबाब जा रही है ।

थार एक्सप्रेस जोधपुर के भगत की कोठी स्टेशन से चलकर भारत देश के आखिरी स्टेशन मुनाबाब तक जाती है और मुनाबाब पर पाकिस्तान की दूसरी थार एक्सप्रेस आती है जो भारतीय थार एक्सप्रेस के यात्रियों को  कराची लेकर जाती है। यह ट्रेन पूरी तरह से कवर्ड रहती है ।

मैं अपनी पैसेंजर ट्रेन से मुनाबाब तक घूम आया, यह भारत का आखिरी रेलवे स्टेशन है इसके बाद रेलवे लाइन एल ओ सी पार करके पाकिस्तान में चली जाती है जहाँ हम नहीं जा सकते थे। यहाँ न कोई शहर था न कोई गांव, सिर्फ था तो केवल रेगिस्तान और भारतीय फ़ौज़ की चौकियां, यहाँ से पाकिस्तान महज एक किलोमीटर दूर था।   मैं मुनाबाब देखकर वापस बाड़मेर आ गया और वहां से फिर जोधपुर । जोधपुर से शाम को मेरा हावड़ा एक्सप्रेस में रिजर्वेशन था दुसरे दिन मैं आगरा पहुँच गया।

जोधपुर  स्टेशन 

JODHPUR RAILWAY STATION

BADMER RAILWAY STATION

BADMER RAILWAY STATION

BADMER

BADMER

BHACHBHAR RAILWAY STATION

RAMSAR RLY. STATION

GAGRIYA RAILWAY STATION

GAGRIYA RAILWAY STATION

BADMER

BADMER

BADMER

BADMER

BADMER TO MUNAWAO

BADMER

BADMER

LEELMA RAILWAY STATION

BADMER

BADMER


MUNABAO RAILWAY STATION IND.

MUNABAO RAILWAY TIME TABLE

MUNABAO

MUNABAO

MUNABAO

MUNABAO RAILWAY STATION

MUNABAO

MUNABAO RLY STATION PAK

MUNABAO

MUNABAO RAILWAY STATION PAKISTAN

JAISINDER RAILWAY STATION

गडरा गांव विभाजन से पहले हिंदुस्तान की जमीन पर था, पर आज यह गांव पाकिस्तान में है और इस गांव का रेलवे स्टेशन आज भी भारत में ही है, रास्ता तो खो गया पर स्टेशन आज भी मौजूद है । और यही वो रेलवे स्टेशन जहाँ दुश्मनों ने रेलवे कर्मचारियों को मौत के  कर इस स्टेशन को आग लगा दी थी ।   

एक राजस्थानी महिला 

राजस्थान 

मुनाबाव - बाड़मेर पैसेंजर 

बाड़मेर  स्टेशन  

          

Saturday, September 7, 2013

AII - JU PASSENGER



अजमेर - जोधपुर  पैसेंजर यात्रा

 
    अजमेर से दोपहर दो बजे जोधपुर के लिए एक पैसेंजर चलती है जो मारवाड़ होते हुए शाम को जोधपुर पहुँच जाती है। इस पैसेंजर ट्रेन में रिजर्वेशन की सुविधा भी उपलब्ध है। मैंने आगरा में ही इस ट्रेन में अपना रिजर्वेशन करवा लिया था। दोपहर दो बजे तक मैं अजमेर स्टेशन पर था और ट्रेन भी अपने सही समय पर स्टेशन से चलने की तैयार खड़ी हुई थी। इसी बीच रानीखेत एक्सप्रेस भी आ चुकी थी। गर मेरा इस पैसेंजर में रिजर्वेशन न होता तो शायद मैं इसी ट्रेन से जोधपुर जाता।

Friday, September 6, 2013

AJMER - 2013

अजमेर दर्शन और तारागढ़ किला 


      एक अरसा बीत चुका था बाबा से मिले,  तो सोचा क्यों न उनके दर पर इस बार हाजिरी लगा दी जाय । बस फिर क्या था, खजुराहो एक्सप्रेस में आरक्षण करवाया और निकल लिए अजमेर की ओर। मैं रात में ही अजमेर पहुँच गया, और वहां से फिर दरगाह। अभी बाबा के दरबाजे खुले नहीं थे, मेरी तरह बाबा के और भी बच्चे उनसे मिलने आये हुए थे जो उनके दरबाजे खुलने का इंतज़ार कर रहे थे, इत्तफाक से आज ईद भी थी। दरगाह का नज़ारा आज देखने लायक था ।

Friday, June 7, 2013

ROOPVAS


एक सफ़र रूपवास की ओर



      आगरा से एक रास्ता जगनेर और तांतपुर की तरफ जाता है, रास्ते में रघुकुल कॉलेज भी पड़ता है जहाँ आज निधि का इतिहास का पेपर था , मैंने निधि को कॉलेज तक छोड़ दिया और इसके चल दिया जगनेर की ओर

 आगरा से जगनेर करीब पचास किमी दूर है, और उत्तर प्रदेश का आखिरी हिस्सा भी है जगनेर के तीनों ओर राजस्थान की सीमा है, जगनेर से कुछ किमी पहले सरेंधी नामक एक चौराहा भी है जहाँ राजस्थान के भरतपुर से एक सड़क धोलपुर की ओर जाती है और उत्तरप्रदेश की एक सड़क तांतपुर से आगरा की ओर आती है अतः दोनों राज्यों की सडकों का मेल सरेंधी पर ही होता है मैं सरेंधी पहुंचा, यहाँ नाश्ते की कुछ दुकाने खुली हुई थी , मैंने दो कचोड़ी खाई और रूपवास की ओर चल दिया

Sunday, January 27, 2013

MAVLI TO MARWAR



कांकरोली से मारवाड़ मीटर गेज पैसेंजर ट्रेन यात्रा


     मैं राजनगर से कांकरोली स्टेशन पहुंचा, अपने निर्धारित समय ट्रेन भी आ पहुंची, सर्दियों के दिन थे इसलिए मुझे धुप बहुत अच्छी लग रही थी। कांकरोली से आगे यह मेरा पहला सफ़र था, मुझे इस लाइन को देखना था, मेवाड़ से ट्रेन मारवाड़ की ओर जा रही थी, मेरे चारों तरफ सिर्फ राजस्थानी संस्कृति ही थी। 

    ट्रेन लावा सरदारगढ़ नामक एक स्टेशन पर पहुंची, यहाँ भी मार्बल की माइंस थीं, और एक किला भी बना हुआ था, शायद उसी का नाम था सरदारगढ़। ट्रेन इससे आगे आमेट पहुंची, आमेट के स्टेशन का नाम चार भुजा रोड है, यहाँ से एक रास्ता चारभुजा जी के लिए जाता है, इससे आगे एक स्टेशन आया नाम था दौला जी का खेडा।

Friday, January 18, 2013

RAJSAMAND - 2013


राजसमन्द में एक बार फिर

     इस बार आगरा में सर्दी काफी तेज थी और  सर्दियों में  फ़ालतू घर पर बैठा था । कल्पना भी अपने मायके गई हुई थी इसलिए अपने आपको फ़ालतू और अकेला महसूस कर रहा था । कंप्यूटर भी इन दिनों खराब पड़ा था,सिवाय टीवी देखने के मेरे पास कोई काम नहीं था, लेकिन टीवी भी बेचारी कब तक मेरा मन लगाती।तभी जीतू का फोन आया तो उसे  मैंने अपनी परेशानी बताई, उसने मुझे अपने पास आने की कहकर मेरी परेशानी मिनटों में हल कर दी ।

Monday, April 2, 2012

KUMBHALGARH





कुम्भलगढ़ और परशुराम महादेव  


कल  हम हल्दीघाटी घूमकर आये थे, आज हमारा विचार कुम्भलगढ़ जाने की ओर था और ख़ुशी की बात ये थी कि आज धर्मेन्द्र भाई ने भी हमारे साथ थे। राजनगर से कुम्भलगढ़ करीब पैंतालीस किमी दूर है , भैया ने मेरे लिए एक बाइक का इंतजाम कर दिया।  भैया,  भाभी और अपने बच्चों के साथ अपनी बाइक पर , जीतू अपनी पत्नी , बच्चों और दिलीप के साथ अपनी बाइक पर और तीसरी बाइक पर मैं और कल्पना थे। 

पहाड़ी रास्तो से होकर हम कुम्भलगढ़ की तरफ बढ़ते जा रहे थे  , मौसम भी काफी सुहावना सा हो गया था , जंगल और ऊँचे नीचे पहाड़ों के इस सफ़र का अलग ही आनंद आ रहा था , मैं बाइक चला रहा था और कल्पना मोबाइल से विडियो बना रही थी। यहाँ काफी दूर तक बाइक बिना पेट्रोल के ही चल रही थी , ढ़लान के रास्तों पर जो करीब तीन किमी लम्बे होते थे ।

HALDIGHATI



हल्दीघाटी - एक प्रसिद्ध रणभूमि


    आज हमारा विचार हल्दीघाटी जाने का बना, जीतू ने आज छुटटी ले थी साथ ही एक बाइक का इंतजाम  भी कर दिया। मैं ,कल्पना, दिलीप, जीतू और उसका बेटा चप्पू दो बाइकों से चल दिए एक प्रसिद्ध रणभूमि की तरफ जिसका नाम था हल्दीघाटी।
 
      यूँ तो हल्दीघाटी के बारे में हम कक्षा चार से ही पढ़ते आ रहे हैं, और एक कविता भी आज तक याद है जो कुछ इसतरह से थी,
             
                        रण बीच चौकड़ी भर भर कर , चेतक बन गया निराला था।
                         महाराणा प्रताप के घोड़े से   , पड़  गया  हवा का पाला था ।।

    हल्दीघाटी के मैदान में आज से पांच सौ वर्ष पूर्व मुग़ल सेना और राजपूत सेना के बीच ऐसा भीषण संग्राम हुआ जिसने हल्दीघाटी को इतिहास में हमेशा के लिए अमर कर दिया और साबित कर दिया कि  भारत देश के वीर सपूत केवल इंसान ही नहीं जानवर भी कहलाते हैं जो अपनी जान की परवाह किये बगैर अपने मालिक के साथ सच्ची वफ़ा का उदाहरण पेश करते हैं। और ऐसा ही एक उदाहरण  हल्दीघाटी के मैदान  में महाराणा प्रताप के घोड़े चेतक ने अपनी जान देकर दिया। ऐसे वीर घोड़े को सुधीर उपाध्याय का शत शत नमन।

Sunday, April 1, 2012

RAJSAMAND - 2012

                                                                                    
                                                                                                                                  


राजसमंद और कांकरोली
                                                          


          श्री नाथजी के दर्शन करके हम राजनगर की ओर रवाना हो लिए, दिलीप एक मारुती वन में बैठ गया, मैं ,जीतू और कल्पना बाइक पर ही चल दिए। रात हो चली थी , राष्ट्रीय राजमार्ग - ८  पर आज हम बाइक से सफ़र कर रहे थे, सड़क के दोनों तरफ मार्बल की बड़ी बड़ी दुकाने और गोदाम थे और रास्ता भी बहुत ही शानदार था।
थोड़ी देर में हम कांकरोली पहुँच गए , यहाँ हमें दिलीप भी मिल गया और हम फिर जीतू के घर गए , भईया को अभी पता नहीं था कि मैं कांकरोली में आ गया हूँ, मेरा संपर्क सिर्फ जीतू के ही साथ था ।  जीतू और धर्मेन्द्र भैया मेरे बड़े मामा जी के लड़के हैं। दोनों ही यहाँ मार्बल माइंस में नौकरी करते हैं, इसलिए अपने परिवार को लेकर दोनों यहीं रहते हैं, मैं पहले भी कई बार कांकरोली और राजनगर आ चुका हूँ, कल्पना और दिलीप पहली बार आये थे। 

Saturday, March 31, 2012

UDAIPUR CITY


झीलों की नगरी - उदयपुर

पिछला भाग - अजमेर 

     अनन्या एक्सप्रेस ने हमें रात को तीन बजे ही उदयपुर दिया। रेलवे सुरक्षा बल के सिपाहियों ने मुझे जगाया और कहा कि क्या इसी मैं सोने का इरादा है क्या ? यह ट्रेन आगे नहीं जाती। मैंने देखा ट्रेन उदयपुर सिटी पर खड़ी हुई है, जो दो चार सवारियां ट्रेन में थीं ,पता नहीं कब चली गई। मैंने जल्दी से कल्पना को जगाया और दिलीप को भी ने जगा दिया था ।

     ट्रेन से उतरकर हम वेटिंग रूम में गए , वहां से नहा धोकर उदयपुर घूमने निकल पड़े, यहाँ से राजमहल करीब तीन किमी था, सुबह सुबह हम पैदल ही राजमहल की ओर निकल पड़े, थोड़ी देर में हम राजमहल के करीब थे , अभी इसके खुलने में काफी समय था इसलिए पास ही के एक पहाड़ पर स्थित किले को देखने के लिए चल पड़े। यूँ तो उदयपुर की विशेषता का वर्णन मैं क्या कर सकता हूँ , इसकी विशेषता का एहसास तो खुद ही यहाँ आकर हो ही जाता है। हम पहाड़ पर पहुंचे , यहाँ एक करणी माता का मंदिर भी है , और एक पुराने किले के अवशेष आज भी देखने को मिलते हैं, यहाँ से पूरे उदयपुर शहर का नजारा स्पष्ट दिखाई देता है।

Friday, March 30, 2012

AJMER




ख्वाज़ा गरीब नवाज के दर पर



     मैं ख्वाजा गरीब नवाज की दरगाह पर हाजिरी देने प्रत्येक साल अजमेर जाता हूँ , इस साल मेरे साथ मेरी पत्नी कल्पना और मेरा भाई दिलीप भी था। मैंने अपनी शादी से पहले ही सियालदाह - अजमेर एक्सप्रेस में रिजर्वेशन करवा रखा था, इस ट्रेन का समय आगरा फोर्ट पर रात को आठ बजे है किन्तु आज यह ट्रेन रात की बजाय सुबह चार बजे आगरा फोर्ट पहुंची। आज हमारी पूरी रात इस ट्रेन के इंतजार में खराब हो गयी, खैर जैसी ख्वाजा जी की मर्जी । मैं आज पहली बार अपनी पत्नी की साथ यात्रा कर रहा था, एक अजीब सी ख़ुशी मेरे दिल में थी, मैं अपनी शादी के बाद अपनी पत्नी को भी सबसे पहले ख्वाजा जी के दर पर ले जाना चाहता था और आज मेरा यह सपना पूरा होने जा रहा था ।