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Friday, June 29, 2018

KGM TO MTJ - KACHHLA GHAT


काठगोदाम से मथुरा - कछला घाट 

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      कछला घाट पहुंचकर देखा तो रेलवे ने अपना वाला पुराना मार्ग बंद कर दिया है जहाँ से कभी रेलमार्ग और सड़कमार्ग एक होकर गंगा जी को पार करते थे। सड़क मार्ग अलग हो गया, मीटरगेज मार्ग भी बंद हो गया परन्तु पब्लिक है कि आज भी रेलवे के बिज के नीचे ही गंगा जी में नहाना पसंद करती है।  लोग आज भी अपनी उस आदत को नहीं बदला पाए जिसपर वर्षों से वे और उनके पूर्वज चलते आ रहे थे।  इसलिए जब रेलवे ही बदल गई तो मजबूरन लोगों की रेलवे ब्रिज की तरफ जाने की आदत को रेलवे ने ब्लॉक् कर दिया। अब मजबूरन लोगों को कछला नगर की तरफ से होकर ही गंगाजी में स्नान करने जाना पड़ता है और हमें भी जाना पड़ा। 

      जब पहली बार एवेंजर गंगाजी में उतरी तभी हवाओं ने हमारी तरफ अपना रुख कर दिया और गंगाजी में बालू को उड़ाती हुई हमारा मार्ग रोक दिया। पर यह भी एवेंजर थी और साथ में लगा स्टुड का हेलमेट जिससे इन हवाओं का हमपर कोई फर्क नहीं पड़ा। हम रेलवे ब्रिज के नीचे पहुंचे और बीच गंगा में जाकर मैंने बाइक को गंगा की धारा के किनारे खड़ा कर दिया। जब माँ गंगा सामने थी और हम सुबह से नहाये हुए भी नहीं थे तो फिर सब्र कैसा तुरंत गंगा जी को प्रणाम कर छलांग लगा दी। और जी भरकर आज गंगा स्नान का लुफ्त उठाया।  कल्पना को शुरुआत में डर अवश्य लगा किन्तु एकबार गंगाजी में प्रवेश करने के बाद उसका भी सारा डर समाप्त हो गया।  जी भरकर गंगा की गोदी में स्नान किया। 

     नहाने के पश्चात मैंने अपनी बाइक एवेंजर को गंगा स्नान कराया और अपने कपडे बदलकर तैयार हो गया। अब सूर्य देवता ठीक सिर के ऊपर थे मतलब बारह बज चुके थे। हवाओं का रुख भी अब काफी तेज हो चुका था इसलिए हम गंगाजी को प्रणाम कर वापस अपनी मंजिल की तरफ बढ़ चले। अगला पड़ाव हमारा सोरों था जो कि एक महत्वपूर्ण तीर्थस्थान कहलाता है।  अगले भाग में पढ़िए। 

KALPANA BATHING IN GANGA RIVER

AVENGER STAND AT BANK OF GANGA 

MY BIKE AVENGER AT GANGA 

AVENGER

MY WIFE KALPANA UPADHYAY 


SUDHIR UPADHYAY AT GANGA

TRAIN PASSING ON BRIDGE OVER GANGA RIVER AT KACHHLA

KACHHLA BRIDGE OVER GANGA RIVER

KACHHLA GHAT

अगली यात्रा -  काठगोदाम से मथुरा, सोरों शूकर क्षेत्र। 

KGM TO MTJ



काठगोदाम से मथुरा की ओर

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      रात को काफी देर से सोने के बाद भी मेरी आँख सुबह जल्दी खुल गई, वेटिंग रूम से बाहर निकलकर देखा तो यात्रियों का आना शुरू हो चुका था। मैंने जल्दी ही अपनी बाइक प्लेटफोर्म से हटाकर बाहर खड़ी कर दी और फिर वापस आकर कल्पना को जगाया। घड़ी में सुबह के पांच बज चुके थे। हम तैयार होकर साढ़े पांच बजे तक फ्री हो गए और मैंने सही साढ़े पांच बजे अपनी बाइक काठगोदाम से मथुरा के लिए रवाना कर दी। काठगोदाम के बाद हल्द्वानी उत्तराखंड का प्रमुख नगर है। यहाँ मैंने इस स्टेशन के भी कुछ फोटो लिए और फिर आगे बढ़ चला। 

     इसके बाद हम लालकुआँ पहुंचे जो पूर्वोत्तर रेलवे का मुख्य जंक्शन स्टेशन है। यहाँ एशिया की सबसे बड़ी कागज उद्दोग कंपनी सेंचुरी स्थित है। लालकुआँ के बाद पंत नगर यहाँ का प्रमुख हवाई अड्डा है। पंत नगर के बाद हम किच्छा पहुंचे। यहाँ से रेलवे लाइन हम से दूर हो गई, यहाँ मैंने अपने सिर की थोड़ी तेल मालिश कराई क्योंकि सुबह से ही मेरे सिर में अत्यधिक दर्द सा हो रहा था और मुझे बाइक चलाने में असुविधा भी महसूस हो रही थी। तेल मालिश के बाद मुझे कुछ राहत सी महसूस हुई, इसके अलावा एक मेडिकल से सारिडॉन की टेबलेट भी ले ली। एक नल से हाथ मुँह धोकर मैं फिर से आगे की तरफ रवाना हो चला।  

     किच्छा के बाद हम उत्तराखंड की सीमा से निकल उत्तर प्रदेश की सीमा आ चुके थे। रेलवे लाइन हमारे साथ ही साथ थी और रास्ते में आने वाले हर रेलवे स्टेशन का मैं फोटो अपने मोबाइल में खींचता जा रहा था। देवरनियां मुझे इस लाइन का खास स्टेशन लगा जहाँ मेरा बैग मेरी बाइक के सायलेंसर की वजह से थोड़ा जल गया था। कुछ देर आरामकर मैं भोजीपुरा होते हुए बरेली पहुंचा और यहाँ बिना रुके सीधे अपनी मंजिल की ओर बढ़ता ही रहा। बरेली से मथुरा की तरफ यह मेरी दूसरी बाइक यात्रा थी, इससे पहले में अपनी पुरानी बाइक CD डीलक्स से पिताजी और मौसाजी यात्रा कर चुका था। रास्ते में एक स्थान पर मैंने कुछ देर रुककर कोल्ड्रिंक पी और फिर आगे बढ़ चला। मुझे इस बाइक यात्रा में सबसे ज्यादा परेशानी बदायूँ शहर में आई जिसमे मैं अपना मार्ग भटक गया और जल्द ही सही राह की पहचान कर मैंने बदायूँ शहर को भी पीछे छोड़ दिया।

     बदायूँ से निकलते ही यह रास्ता सिंगल लेन का हो गया था। यहाँ से कुछ आगे एक बालाजी का आश्रम आता है जहाँ हनुमान जी की विशाल प्रतिमा स्थित है। मैं जब पिताजी और मौसाजी के साथ यहाँ आया था तब हमने कुछ देर यहाँ रूककर आराम किया था। अब पिताजी नहीं हैं बस उनकी यादों को कुछ पल मैंने यहाँ महसूस किया। मानो ऐसा लगा जैसे वो साक्षात न होकर भी हमारे साथ ही थे। मैं अपने पिताजी से अत्यधिक प्रेम करता हूँ और समय से पहले ही मैंने उन्हें खो भी दिया परन्तु आज जहाँ भी जाता हूँ अपने पिताजी को अपने साथ ही पाता हूँ। यह मेरे दिल का उनसे नाता ही है जो मुझे उनसे हमेशा जोड़े रखता है और वो भी हरकदम पर मेरी रक्षा करते हैं जिसके कारण ही मैं अपनी प्रत्येक यात्रा को सफल बना पाता हूँ। 

    यहाँ से आगे चलकर उझानी नाम का एक नगर आया, मैं यहाँ न रुककर सीधे गंगाजी के घाट पर ही रुकना चाहता था जो अब यहाँ से कुछ ही दूर था। कल्पना भी यही चाहती थी इसलिए हम उझानी में नहीं रुके और सीधे गंगा जी की तरफ कछला घाट को रवाना हो गए। 

यह यात्रा बेशक बाइक से की गई है किन्तु नीचे दिए गए फोटुओं को देखकर आपको यही लगेगा कि ये एक बाइक यात्रा नहीं, रेल यात्रा है।  एक में दो का मजा इसे ही कहते हैं। 

KATHGODAM RAILWAY STATION 

HALDWANI SIGN RAILWAY BOARD 

HALDWANI STATION 

HALDWANI 

HALWANI RAILWAY STATION 

A VIEW OF SHIVALIK RENGE FROM HALDWANI 

HALDWANI RAILWAY STATION 

WELCOME TO LALKUAN

LALKUAN JUNCTION 

LALKUAN RAILWAY STATION 

LUCKNOW - KATHGODAM EXPRESS REACHED ON LALKUAN STATION

PANT NAGAR RAILWAY STATION 

THANKS VISIT FOR UTTRAKHAND

DEORANIYAN RAILWAY STATION

SUDHIR UPADHYAY ON DEORANIYAN

ATAMANDA

ATAMANDA RAILWAY STATION 

VIEW OF BHOJIPURA RAILWAY STATION FROM OVER BRIDGE

BAREILLY CLOCK TOWER
    
BALAJI DARBAR IN BADAYUN


HANUMAN STATUE IN BADAYUN

JAI HANUMAN 
MY FATHER AND MY MOUSAJI IN BALAJI DARBAR BADAYUN AT 2014

अगली यात्रा  - काठगोदाम से मथुरा, कछला घाट 

Thursday, June 28, 2018

KATHGODAM RAILWAY STATION



काठगोदाम रेलवे स्टेशन पर एक रात 


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     नौकुचियाताल के बाद अब हमने घर वापस लौटने की तैयारी शुरू कर ली थी, मैं घर पर माँ को बताकर नहीं आया था कि मैं नैनीताल बाइक से ही जा रहा हूँ, इस यात्रा के दौरान मैं उनसे यही कहता रहा कि मैं ट्रेन से ही आया हूँ हालाँकि मैं यहाँ से और आगे की यात्रायें भी कर सकता था परन्तु अब मुझसे अपनी माँ से सच नहीं छिपाया जा रहा था और मैं इससे अधिक उनसे झूठ भी नहीं बोल सकता था। अब मेरे मन और दिल ने मुझे धिक्कारना शुरू कर दिया था इसीलिए मैंने अब वापसी की राह ही चुनी। मैं शीघ्र से शीघ्र घर लौट जाना चाहता था इसलिए नौकुचिया के बाद मेरी बाइक का रुख अब घर की तरफ हो चला था। 

      शाम करीब ही थी, थोड़ी देर में सूरज भी ढलने ही वाला था और हम अभी भी जमीन से बहुत ऊँचाई पर थे, मैं अँधेरा होने से पहले ही इन पहाड़ों से नीचे उतरजाना चाहता था इसलिए बाकी के सभी तालों को छोड़कर मैं काठगोदाम की तरफ रवाना हो गया जो कुमाँयू का प्रवेश द्धार था। मैं वापस भीमताल पहुंचा और यहाँ से मैंने नीचे की तरफ उतरना शुरू कर दिया, यह रास्ता देखने में अत्यंत ही खतरनाक था परन्तु शानदार भी था। गहरी घाटियों के बीच मेरी बाइक धीरे धीरे नीचे की तरफ उतर रही थी और मुझे यही लग रहा था कि बस थोड़ी देर में मैं काठगोदाम पहुँच जाऊँगा, परन्तु शायद मैं गलत था। काठगोदाम नीचे जरूर था किन्तु इतना भी पास नहीं था जितना मैं सोचता आ रहा था।  

     रास्ते में पहाड़ों पर मक्का की खेती भी एक शानदार नजारा थी, यहाँ मैंने कुछदेर रुककर गर्म गर्म भुटिया कल्पना को खिलाई और बारिश के रुकने का इंतज़ार किया। पहाड़ी बरसात का कोई भरोशा नहीं होता कभी भी शुरू हो जाती है कभी भी बंद। अँधेरा होने तक मैं काठगोदाम पहुँच चुका था, मैं पहली बार काठगोदाम आया था और आते ही तेज बारिश ने हमारा जोरदार स्वागत किया। एक बड़े पेड़ के नीचे हमने स्वयं को भीगने से बचाया। माँ से किये वादे के अनुसार मुझे यहाँ भी रेलवे का ही सहारा लेना पड़ा जो मैं इस यात्रा में शुरू से लेता ही आ रहा था। हम सबसे पहले रेलवे स्टेशन पहुंचे, यह पूर्वोत्तर रेलवे का आखिरी स्टेशन है और काफी शानदार बना हुआ है। बाइक बाहर खडी कर हम प्लेटफार्म पर पहुंचे और यहाँ अपना स्थान जमाकर कुछ देर मोबाइल फोन को चार्ज किया। 

     मैं कल्पना के लिए बाहर से एक होटल वाले से खाना पैक कराकर लाया, वो होटल वाला भी ब्रजभाषा बोल रहा था और उसका स्टाफ भी। मुझे यह सुनकर बड़ा आश्चर्य हुआ कि कुमांयूनी प्रदेश में मेरी ब्रजभाषा .. जो शायद कई दिन बाद मैंने सुनी थी, मैंने उस होटल वाले से पुछा तो उसने बताया कि वो फ़िरोज़ाबाद का रहने वाला है और इस होटल के मालिक भी फ़िरोज़ाबाद के ही हैं। जब उसे पता चला कि मैं मथुरा से यहाँ बाइक से आया हूँ तो वह बड़ा चकित हुआ और खुश भी इसलिए उसने मुझे खाना भी फिरउसी रेट से दिया जिस रेट से ब्रज में मुझे मिलना चाहिए था । मैं खाना लेकर स्टेशन पहुंचा, रानीखेत एक्सप्रेस चलने के लिए तैयार खड़ी हुई थी इसके बाद बाघ एक्सप्रेस का नंबर था। 

     बाघ एक्सप्रेस के चले जाने के बाद स्टेशन एक दम खाली हो गया। अब प्लेटफॉर्म पर हम और रेलवे के कुछ कर्मचारी ही बचे थे। माँ के रेलवे पास के जरिये मैंने वेटिंग रूम में ही अपना बिस्तर लगाया और कल्पना को सुला दिया। अब मुझे बाइक का भी कुछ इंतज़ाम करना था, यहाँ पार्किंग केवल दिन में ही लगती है रात के समय वहां कोई नहीं होता, इसलिए मैंने अपनी बाइक को प्लेटफॉर्म पर ही खड़ा कर दिया और आराम से सो गया। 

काठगोदाम की तरफ लौटने में पहाड़ 


काठगोदाम की तरफ 

कुमाँयू 


काठगोदाम में एक चौराहा 

बरसात के रुकने तक इसी पेड़ के नीचे हम रुके रहे 


रात्रि के समय काठगोदाम स्टेशन का एक दृशय 

काठगोदाम रेलवे स्टेशन 

काठगोदाम पर रानीखेत 



   

अगली यात्रा - मथुरा की तरफ वापसी 

Wednesday, April 25, 2018

KANGRA 2018



नगरकोट धाम वर्ष २०१८ 


        इस बार काँगड़ा जाने की एक अलग ही ख़ुशी दिल में महसूस हो रही थी, इसका मुख्य कारण था करीब पांच साल बाद अपनी कुलदेवी माता बज्रेश्वरी के दर्शन करना और साथ ही अपनी पत्नी कल्पना को पहली बार नगरकोट ले जाना। यह सपना तो पहले भी पूरा हो सकता था परन्तु वो कहते है न जिसका बुलाबा जब भवन से आता है तभी वो माता के दर्शन का सुख पाता है। इसबार माँ ने मुझे भी बुलाया था और कल्पना को भी साथ इस यात्रा में मेरी माँ मुख्य यात्री रहीं। अन्य यात्रियों में मेरे बड़े मामाजी रामखिलाड़ी शर्मा उनकी पत्नी रूपवती शर्मा, मेरे एक और मामा किशोर भारद्धाज उनकी पत्नी रितु एवं उनके बच्चे गौरव और यतेंद्र। इनके अलावा मेरी बुआजी कमलेश रावत और मेरा दोस्त कुमार भाटिया अपने बेटे क्रियांश और अपनी पत्नी हिना भाटिया और उसके साले साहब कपिल वासवानी अपनी पत्नी रीत वासवानी के साथ थे। 

Friday, March 23, 2018

BHATINDA PASSENGER



  फ़िरोज़पुर - भटिंडा - रेवाड़ी  पैसेंजर यात्रा 

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        हुसैनीवाला से वापस मैं फ़िरोज़पुर आ गया, यहाँ से भटिंडा जाने के लिए एक पैसेंजर तैयार खड़ी हुई थी जो जींद की तरफ जा रही थी परन्तु मैं भटिंडा से रेवाड़ी वाली लाइन यात्रा करना चाहता था इसलिए सीधे भटिंडा का टिकट लेकर ट्रेन में पहुंचा और खाली पड़ी सीट पर जाकर बैठ गया। शाम चार बजे तक भटिंडा पहुँच गया परन्तु चार से पांच बज गए इस ट्रेन को भटिंडा के प्लेटफॉर्म पर पहुँचने में। तभी दुसरे प्लेटफॉर्म पर खड़ी रेवाड़ी पैसेंजर ने अपना हॉर्न बजा दिया, मैं जींद वाली पैसेंजर से उतरकर लाइन पार करके रेवाड़ी पैसेंजर तक पहुंचा , ट्रेन तब तक रेंगने लगी थी, इस ट्रेन में बड़ी जबरदस्त मात्रा में भीड़ थी जबकि ये भटिंडा से ही बनकर चलती है।

HUSAINIWALA BORDER


शहीदी मेला -  भगत सिंह जी की समाधि पर


           मैंने सुना था कि पंजाब में एक ऐसी भी जगह है जहाँ साल में केवल एक ही बार ट्रेन चलती है और वो है फ़िरोज़पुर से हुसैनीवाला का रेल रूट। जिसपर केवल वैशाखी वाले दिन ही ट्रेन चलती है, जब मैंने इसके बारे में विस्तार से जानकारी की तो पता चला कि यहाँ साल में एक बार नहीं दो बार ट्रेन चलती है, वैसाखी के अलावा शहीदी दिवस यानी २३ मार्च को भी। इसलिए इसबार मेरा प्लान भी बन गया शहीदी दिवस पर भगत सिंह जी की समाधी देखना और साल में दो बार चलने वाली इस ट्रेन में रेल यात्रा करना। मैंने मथुरा से फ़िरोज़पुर तक पंजाब मेल में रिजर्वेशन भी करवा दिया। अब इंतज़ार था तो बस यात्रा की तारीख का। और आखिर वो समय भी भी आ गया।

Monday, October 23, 2017

BUDDH POORNIMA EXPRESS



बुद्धपूर्णिमा एक्सप्रेस - गया से पटना और राजगीर

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         रोहतासगढ़ से लौटने के बाद मैं डेहरी ऑन सोन स्टेशन पर आ गया था, यहाँ से गया जाने के लिए मुझे झारखण्ड स्वर्णजयंती एक्सप्रेस मिल गई और सोन नदी पुल पार करके मैं गया पहुँच गया। गया पहुँचने तक मुझे शाम हो चुकी थी, स्टेशन पर उतरकर मुझे अनायास ही एहसास हुआ कि यह एक तीर्थ स्थान है और मुझे माँ को यहाँ लेकर आना चाहिए था। स्टेशन से बाहर निकलकर मैं बाजार पहुंचा और विष्णुपद मंदिर की तरफ रवाना हो गया। काफी चलने के बाद जब मैं थक गया तो एक हेयर सैलून में अपने बाल कटवाने पहुँच गया। बाल कटवाने के बाद मैं फिर से विष्णुपद मंदिर की तरफ रवाना हुआ फिर मन में सोचा कि अब रात भी हो चुकी है और पटना जाने वाली ट्रेन का समय भी होने वाला है, किसी दिन माँ के साथ ही आऊंगा तभी विष्णु जी के दर्शन भी हो जायेंगे और फल्गु नदी को भी देख लेंगे इसके अलावा बौद्ध गया का मंदिर भी देख लेंगे, अभी गया घूमने का उपयुक्त समय नहीं है इसलिए बिना दर्शन किये ही वापस स्टेशन आ गया।

Saturday, October 21, 2017

AGRA KOLKATA EXPRESS


बिहार की तरफ एक सफ़र

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आज भैया दौज का त्यौहार था, अपनी बहनो से सुबह पाँच बजे ही टीका करवाकर मैं अकेला ही उस सफर पर निकल पड़ा जहाँ जाने के लिए ना जाने कब से मैं विचार बना रहा था।  सुबह सुबह हलकी ठण्ड शुरू हो चुकी थीं। मैं पैदल ही स्टेशन पहुँच गया था। आगरा कैंट से चलकर कोलकाता जाने वाली 13168 कोलकाता एक्सप्रेस मुझे मथुरा स्टेशन पर तैयार खड़ी हुई मिली। यह ट्रेन आगरा से तो खाली आती है परन्तु मथुरा आकर यह फुल हो जाती है। अधिकतर बंगाल के लोग इस ट्रेन का उपयोग कोलकाता से मथुरा आने के लिए ही करते हैं। और मथुरा से ही यह कोलकाता जाने के लिए। खैर मैं आज बिना रिजर्वेशन था, जनरल कोच में मुझे जगह नहीं दिखी इसलिए  में खड़े खड़े ही सफर शुरू कर दिया।