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Saturday, February 17, 2018

BAHULAVAN




बहुलावन - ग्राम बाटी 


       ब्रज के बारह वनो में से एक बहुलावन ब्रज का चौथा वन है जहाँ बहुला बिहारी के साथ साथ बहुला गौ माता के दर्शन हैं। मथुरा से आठ किमी दूर स्थित ग्राम बाटी में स्थित  ब्रज का पौराणिक स्थल बहुलावन अत्यंत ही प्राकृतिक और ब्रज की धार्मिक धरोहर के रूप में व्यवस्थित है। यहाँ भगवान् श्री कृष्ण ने बहुला गाय की बाघ से रक्षा की थी। इसकी कथा निम्नप्रकार है -

        एक श्री कृष्ण भक्त ब्राह्मण के यहाँ बहुला नाम की एक गाय थी। एक दिन वन में चरते चरते वो गाय इस स्थान पर आ गई, इसी स्थान पर पहले से घात लगाए हुए एक बाघ बैठा था जिसने बहुला गाय पर हमला कर दिया। तब गाय ने बाघ से विनती की कि मेरा एक छोटा बछड़ा है, मैं केवल  अंतिम बार उसे अपना दूध पिलाना चाहती हूँ। उसे दूध पिलाकर मैं वापस आ जाउंगी तब तुम मेरा भक्षण कर लेना। बाघ ने उसकी यह शर्त मान ली सुर गाय को जाने दिया और उसकी वापस आने की प्रतीक्षा करने लगा।

    शर्तानुसार गाय अपने बछड़े के पास पहुंची और रोते हुए उससे कहने लगी कि वत्स तुम अंतिम बार आज दुग्धपान करलो इसके बाद मैं तुम्हे दूध पिलाने को जीवित नहीं मिलूंगी मुझे वनराज का आहार बनने जाना है। अपनी माँ की बात सुनकर बछड़े ने कहा की अगर मैं उस बाघ से आपको नहीं बचा पाया तो मैं भी बाघ का आहार बन जाऊँगा। गाय और बछड़े की बातें सुनकर ब्राह्मण ने भी प्रतिज्ञा की कि मैं अगर इन दोनों को बाघ से नहीं बचा पाया तो मैं भी व्याघ्र का आहार बन जाऊंगा।

      ऐसा सोचते हुए तीनो व्याघ्र के सम्मुख आ गए। गाय के साथ बाकी दोनों को आता देखकर बाघ ने गाय से कहा कि मैंने तो केवल तुम्हे खाने का वचन लिया था नाकि इनको फिर इन दोनों का यहाँ आने का क्या प्रयोजन है ? तब ब्राह्मण और बछड़ा बोले  - अगर हम गाय को नहीं बचा पाए तो हम भी आपके भोग की सामग्री बन जाएंगे। तीनो को अपना शिकार बनते देख बाघ बहुत खुश हुआ और तीनो से बोला ठीक तुम तीनो जैसा चाहो। वैसे भी मुझे कई दिनों से भूख लगी है जो तुम तीनो को खाकर आज पूरी हो जाएगी।

      तभी वहां से गुजरते हुए नारद जी ने जब ये घटना सुनी और देखी तो उन्होंने भगवान विष्णु से आग्रह किया और भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से बाघ का वध कर गाय बछड़ा और ब्राह्मण की रक्षा की। तभी से यह स्थान बहुलावन के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

       यहाँ एक बहुला कुंड भी दर्शनीय है जिसके किनारे बहुला बिहारी, बहुला गाय का सुन्दर मंदिर है और श्री बल्लभाचार्य जी की बैठक दर्शनीय है।

    यूँ तो यह सम्पूर्ण क्षेत्र बहुलावन कहलाता है किन्तु इस वन में स्थित गॉंव बाटी  के नाम से प्रसिद्ध है। अधिकतर ग्रामवासी यहाँ गाय पालते हैं। इस ग्राम की मान्यता है कि जब किसी के यहाँ  कोई गाय या भैंस बच्चे को जन्म देती है तो उसका दूध सबसे पहले बहुला बिहारी और बहुला गाय को चढ़ाया जाता है। लोग इस  चारों तरफ परिक्रमा लगाते हैं।

वराह पुराण के अनुसार बहुला वन : -  

पञ्चमं बहुलं नाम वनानं वनमुत्तमं। 
तत्र गतो नरो देवि अग्निस्थानम स गच्छति।।

अर्थात द्वादश वनो में बहुला नामक वन पंचम वन एवं वनों में से श्रेष्ठ है। हे देवी जो लोग इस वन में आते हैं वे मृत्यु पश्चात अग्निलोक को प्राप्त करते हैं।


BAHULAVAN

बहुलाकुण्ड का एक दृश्य 


श्री बहुलाकुण्ड 

बहुलावन मंदिर 

बहुलाकुण्ड 


बहुलावन लीला 

श्री बहुला बिहारी और बहुला गाय के दिव्य दर्शन 


श्री बहुलाकुण्ड ( जीर्णोद्धार के कारण अभी इसमें पानी नहीं है )


बहुलावन रोड 


बहुलावन का एक पुराना दृशय 

* महाप्रभु जी की बैठक 

* श्री बहुला बिहारी जी 

*बहुला गाय और बाघ 



Thursday, October 12, 2017

RADHAKUND



 राधाकुंड मेला - अहोई अष्टमी की एक रात


       माना जाता है कि अहोई अष्टमी की मध्य रात्रि को राधाकुंड में स्नान किया जाये तो एक वर्ष के अंदर संतान प्राप्ति का सुख निश्चित प्राप्त होता है। कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मध्य रात्रि राधाकुंड में स्नान करने का पौराणिक महत्त्व है इस दिन ब्रज की अधिष्ठात्री देवी श्री राधारानी इस कुंड में एक साथ स्नान करने वाले भक्तो को संतान प्राप्ति का फल देती हैं और साल भर के भीतर उनके यहाँ संतान जन्म लेती है। इस दिन गोवर्धन मथुरा स्थित राधाकुंड में विशाल मेला लगता है। राधाकुंड का निर्माण स्वयं भगवान कृष्ण ने अपनी बांसुरी की नोक से खोदकर किया था जब उन्होंने बछड़े का रूप लेकर आये महादैत्य अरिष्टासुर का वध किया था जिससे उन्हें गोहत्या का पाप लगा। राधारानी के कहने पर इस पाप से मुक्ति पाने के भगवान कृष्ण ने सभी तीर्थों का जल राधाकुंड में मिलकर उसमे स्नान किया और गोहत्या के पाप से मुक्ति पाई साथ ही राधारानी को यह वरदान दिया कि कृष्ण पक्ष की अष्टमी की मध्य रात्रि जो भी इस कुंड में स्नान करेगा उसे संतान की प्राप्ति अवश्य होगी।

Sunday, October 1, 2017

BALDEV




दाऊजी मंदिर - बलदेव धाम 


यूँ तो मथुरा को भगवान कृष्ण और राधा की लीलास्थली के रूप में जाना जाता है किन्तु भगवान श्री कृष्ण के बड़े भाई बलभद्र जी भी थे जो कि शेषनाग के अवतार थे। कृष्ण जी उन्हें बड़े प्यार से दाऊ भईया कह कर पुकारते थे। त्रेतायुग में भगवान् राम के छोटे भाई लक्ष्मण के रूप में शेषनाग जी ने अवतार लिया था और द्वापर युग में बलभद्र के रूप ये देवकी की सातवीं संतान थे जो संकर्षण के जरिये बसुदेव जी की दूसरी पत्नी रोहिणी के गर्भ से जन्मे थे जिस कारन इन्हे संकर्षण भगवान भी कहा जाता है। मथुरा से सादाबाद मार्ग पर 20  किमी आगे बलदेव नामक स्थान जहाँ दाऊजी का विशाल मंदिर है। यहाँ दूर दूर से काफी संख्या में लोग दाऊजी के दर्शन करने आते हैं।

Friday, September 29, 2017

KUSUM SAROVER


गोवर्धन परिक्रमा एवं कुसुम सरोवर

       अभी कुछ ही दिनों पहले मेरी कंपनी का गोवर्धन क्षेत्र में एक इवेंट लगा जिसकी मुनियादी गोवेर्धन क्षेत्र के आसपास कराई जानी थी जिसकी जिम्मेदारी मुझे सौंपी गई। मैंने एक टिर्री बुक की,  जिसमे स्पलेंडर बाइक फिट थी और पीछे आठ दस सवारियों के बैठने की जगह थी। इस टिर्री के साथ मैंने मुनियादी करने  के लिए  गोवर्धन परिक्रमा क्षेत्र को चुना। मौसम आज सुहावना था, सुबह सुबह खूब तेज बारिश पड़ी इसलिए मौसम में काफी ठंडक भी थी। गोवर्धन का परिक्रमा मार्ग कुल 21 किमी का है जो  दो भागों में विभाजित है बड़ी परिक्रमा और छोटी परिक्रमा। बड़ी परिक्रमा कुल चार कोस की है, मतलब 12 किमी और छोटी 3 कोस की मतलब 9 किमी की।

        गोवर्धन के मुख्य मंदिर दानघाटी से परिक्रमा शुरू होती है जो आन्यौर होती हुई राजस्थान की सीमा में प्रवेश करती है जहाँ पौराणिक पूँछरी के लौठा का मुख्य मंदिर है। यह गोवर्धन पर्वत का अंतिम स्थल है इसके बाद परिक्रमा पर्वत के दूसरी तरफ वापस दानघाटी की तरफ मुड़ जाती है जो जतीपुरा होते हुए वापस गोवर्धन जाती है। यह 12 किमी की बड़ी परिक्रमा है, यहाँ से अब छोटी परिक्रमा शुरू होती है जो गोवर्धन के बड़े बाजार से होती हुई राधाकुंड पहुंचती है। राधाकुंड से आगे कुसुम सरोवर के नाम से एक पौराणिक स्थल है जो अत्यंत ही खूबसूरत है।

कुसुम सरोवर से सीधे हम वापस गोवर्धन पहुंचते हैं , यह परिक्रमा इन्फिनिटी के डिज़ाइन की तरह है, गोवर्धन परिक्रमा के दौरान अनेको छोटे और बड़े मंदिर  पड़ते हैं जो कि दर्शनीय हैं।


गोवर्धन का एक मंदिर 

ऋणमोचन कुंड 

मानसी गंगा द्धार 

गोवर्धन 

जय गिर्राज जी महाराज 



दानघाटी मंदिर 




पूँछरी का लौठा , गोवर्धन, राजस्थान 





रूद्र कुंड 


चूतड़ टेका , एक विश्राम स्थल 

कुसुम सरोवर 

कुसुम सरोवर 

कुसुम सरोवर 

टिर्री वाला भाई 




प्राचीन कुंआ , कुसुम सरोवर 




जपाकर शर्मा , सिद्ध यात्री निवास होटल के डायरेक्टर 
  

Saturday, September 2, 2017

KANS FORT


कंस किला और वेदव्यास जी का जन्मस्थान


कई बार सुना था कि मथुरा में कहीं कंस किला है, पर देखा नहीं था। आज इरादा बना लिया था कि जो चाहे हो देखकर रहूँगा। मैं अपनी बाइक से मथुरा परिक्रमा मार्ग पर गया और पाया कि आज ब्रज की अनमोल धरोहरों का आज मैं अकेला अवलोकन कर रहा हूँ। सबसे पहले मेरी बाइक चक्रतीर्थ पहुंची जहाँ भगवान शिव् का भद्रेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन हुए और मंदिर के ठीक सामने चक्रतीर्थ स्थित है।  इसके बाद कृष्ण द्वैपायन भगवान वेदव्यास जी की जन्मस्थली पहुंचा। यहाँ भी सुन्दर घाट बने हुए थे पर अफ़सोस यमुना यहाँ से भी काफी दूर चली गई थी और यमुना में से निकली एक नहर इन घाटों को छूकर निकल रही थी।