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Sunday, March 4, 2018

KATNI JUNCTION


                                                             
                माँ जालपा देवी मंदिर - कटनी एवं रेल यात्रा 

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       रायपुर एक शानदार रेलवे स्टेशन है और हो भी क्यों न, आखिरकार यह छत्तीसगढ़ राज्य की राजधानी भी है। रेलवे स्टेशन पर बने भोजनालय में खाना खाकर मैं भूख से निर्वृत हो गया और प्लेटफॉर्म पर टहलने लगा। मुझे अब मथुरा की तरफ वापसी करनी थी इसलिए अब मैं कटनी की तरफ जाने वाली ट्रेन की प्रतीक्षा में था। मोबाइल में ट्रेन का पता किया, रात को सवा बारह बजे एक ट्रेन दिखाई दी गोंदिया - बरौनी एक्सप्रेस जो प्रतिदिन चलती है। इसको यहाँ रात सवा बारह बजे आना चाहिए था, परन्तु यह अपने निर्धारित समय से साढ़े तीन घंटे लेट यानी सुबह पौने चार बजे आई। मेरी पूरी रात ख़राब हो चुकी थी परन्तु सुबह की नींद सबसे ज्यादा अच्छी होती है इसलिए इसके जनरल कोच में खिड़की वाली सीट पर स्थान जमाया और चादर ओढ़ कर सो गया।

Saturday, March 3, 2018

RAJIM


 राजीव लोचन मंदिर  - राजिम 

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       सिरपुर से लौटकर हम महासमुंद आ गए, दोपहर के डेढ़ बजे थे और मैंने सिवाय एक समोसे के कुछ भी नहीं खाया था और मैं बिना नहाये कुछ खाना भी नहीं चाहता था। बस स्टैंड पहुंचकर देखा तो राजिम जाने वाली बस तैयार खड़ी थी, राजिम से चलकर यह कुछ देर फिंगेश्वर में खड़ी रही। फिंगेश्वर के बाद सीधे शाम चार बजे हम राजिम पहुँच गए। मुझे लगा था कि यहाँ महानदी पर घाट बने होंगे और मुझे महानदी में नहाने का मौका  मिलेगा परन्तु यहाँ भी मेरी मनोकामना पूर्ण नहीं हो पाई।  नदी में पानी तो था परन्तु घाटों से बहुत दूर। राजिम छत्तीसगढ़ का एक मुख्य धार्मिक स्थल है  इसे छत्तीसगढ़ का प्रयाग भी कहा जाता है।

SIRPUR



सिरपुर  - एक ऐतिहासिक नगर 

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        सुबह दस बजे के आसपास हम महासमुंद पहुँच गए थे, यह रायपुर के नजदीक छत्तीगढ़ का जिला है।  मैं और आकाश, निधि को बेंच पर बैठाकर स्टेशन के आरक्षण केंद्र पहुंचे। यहाँ हमने अपने लौटने के लिए गोंडवाना में दो दिन बाद का रिजर्वेशन कराया। इसके बाद स्टेशन से थोड़ी दूरी पर बने बस स्टैंड पहुंचे। हालाँकि मध्य प्रदेश की तरह यहाँ भी रोडवेज बसें नहीं चलती किन्तु प्राइवेट बसें बहुत थीं। हमें सिरपुर जाना था जो यहाँ से करीब 37 किमी दूर है।

Friday, March 2, 2018

MAHASAMUND



महासमुंद की ओर

         पिछली बार जब छत्तीसगढ़ की यात्रा पर दुर्ग गया था तो मेरे पिताजी मेरे साथ थे। यह मेरे साथ मेरे पिताजी की अंतिम यात्रा थी। इस यात्रा से लौटने के तीन माह बाद ही पिताजी मुझे इस संसार में हमेशा के लिए अकेला छोड़ गए।  पिताजी तो नहीं रहे पर उनकी यादें हमेशा मेरे साथ रहती हैं। अब तीन साल हो चुके हैं और मुझे छत्तीसगढ़ फिर से बुला रहा था। यात्रा करने के लिए मुझे सबसे ज्यादा परेशानी ऑफिस से छुट्टी लेने में आती है। आसानी से नहीं मिलती, प्राइवेट नौकरी है  कोई जुगाड़ सोचनी पड़ती है।