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Monday, September 25, 2017

WAIR FORT


 DATE :- 16 JULY 2016

ऊषा मंदिर और वैर फोर्ट 

यात्रा एक साल पुरानी है परन्तु पब्लिश होने में एक साल लग गई, इसका एक अहम् कारण था इस यात्रा के फोटोग्राफ का गुम हो जाना परन्तु भला हो फेसबुक वालों का जिन्होंने मूमेंट एप्प  बनाया और उसी से मुझे मेरी एक साल पुरानी राजस्थान की मानसूनी यात्रा के फोटो प्राप्त हो सके। यह यात्रा मैंने अपनी बाइक से बरसात में अकेले ही की थी। मैं मथुरा से भरतपुर पहुंचा जहाँ पहली बार मैंने केवलादेव घाना पक्षी विहार देखा परन्तु केवल बाहर से ही क्योंकि इसबार मेरा लक्ष्य कुछ और ही था और मुझे हर हाल में अपनी मंजिल तक पहुंचना ही था , मेरे पास केवल आज का ही समय था शाम तक मुझे मथुरा वापस भी लौटना था।

Monday, April 2, 2012

KUMBHALGARH





कुम्भलगढ़ और परशुराम महादेव  


कल  हम हल्दीघाटी घूमकर आये थे, आज हमारा विचार कुम्भलगढ़ जाने की ओर था और ख़ुशी की बात ये थी कि आज धर्मेन्द्र भाई ने भी हमारे साथ थे। राजनगर से कुम्भलगढ़ करीब पैंतालीस किमी दूर है , भैया ने मेरे लिए एक बाइक का इंतजाम कर दिया।  भैया,  भाभी और अपने बच्चों के साथ अपनी बाइक पर , जीतू अपनी पत्नी , बच्चों और दिलीप के साथ अपनी बाइक पर और तीसरी बाइक पर मैं और कल्पना थे। 

पहाड़ी रास्तो से होकर हम कुम्भलगढ़ की तरफ बढ़ते जा रहे थे  , मौसम भी काफी सुहावना सा हो गया था , जंगल और ऊँचे नीचे पहाड़ों के इस सफ़र का अलग ही आनंद आ रहा था , मैं बाइक चला रहा था और कल्पना मोबाइल से विडियो बना रही थी। यहाँ काफी दूर तक बाइक बिना पेट्रोल के ही चल रही थी , ढ़लान के रास्तों पर जो करीब तीन किमी लम्बे होते थे ।

HALDIGHATI



हल्दीघाटी - एक प्रसिद्ध रणभूमि


    आज हमारा विचार हल्दीघाटी जाने का बना, जीतू ने आज छुटटी ले थी साथ ही एक बाइक का इंतजाम  भी कर दिया। मैं ,कल्पना, दिलीप, जीतू और उसका बेटा चप्पू दो बाइकों से चल दिए एक प्रसिद्ध रणभूमि की तरफ जिसका नाम था हल्दीघाटी।
 
      यूँ तो हल्दीघाटी के बारे में हम कक्षा चार से ही पढ़ते आ रहे हैं, और एक कविता भी आज तक याद है जो कुछ इसतरह से थी,
             
                        रण बीच चौकड़ी भर भर कर , चेतक बन गया निराला था।
                         महाराणा प्रताप के घोड़े से   , पड़  गया  हवा का पाला था ।।

    हल्दीघाटी के मैदान में आज से पांच सौ वर्ष पूर्व मुग़ल सेना और राजपूत सेना के बीच ऐसा भीषण संग्राम हुआ जिसने हल्दीघाटी को इतिहास में हमेशा के लिए अमर कर दिया और साबित कर दिया कि  भारत देश के वीर सपूत केवल इंसान ही नहीं जानवर भी कहलाते हैं जो अपनी जान की परवाह किये बगैर अपने मालिक के साथ सच्ची वफ़ा का उदाहरण पेश करते हैं। और ऐसा ही एक उदाहरण  हल्दीघाटी के मैदान  में महाराणा प्रताप के घोड़े चेतक ने अपनी जान देकर दिया। ऐसे वीर घोड़े को सुधीर उपाध्याय का शत शत नमन।