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Saturday, July 14, 2018

MARIAM TOMB



मरियम -उज़ -जमानी का मक़बरा 

     सन 1527 में बाबर ने जब फतेहपुर सीकरी से कुछ दूर उटंगन नदी के किनारे स्थित खानवा के मैदान में अपने प्रतिद्वंदी राजपूत शासक राणा साँगा को हराया तब उसे यह एहसास हो गया था कि अगर हिंदुस्तान को फतह करना है और यहाँ अपनी हुकूमत स्थापित करनी है तो सबसे पहले हिंदुस्तान के राजपूताना राज्य को जीतना होगा, इसके लिए चाहे हमें ( मुगलों ) को कोई भी रणनीति अपनानी पड़े। बाबर एक शासक होने के साथ साथ एक उच्च कोटि का वक्ता तथा दूरदर्शी भी था। इस युद्ध के शुरुआत में राजपूतों द्वारा जब मुग़ल सेना के हौंसले पस्त होने लगे तब बाबर के ओजस्वी भाषण से सेना में उत्साह का संचार हुआ और मुग़ल सेना ने राणा साँगा की सेना को परास्त कर दिया और यहीं से बाबर के लिए भारत की विजय का द्धार खुल गया।  इस युद्ध के बाद बाबर ने गाज़ी की उपाधि धारण की।  

     बाबर की इस दूरदर्शी सोच और उसकी रणनीति को उसके पौत्र अकबर ने भलीभाँति समझा और इसी के अनुसार उसने हिन्दुस्तान में राजपूतों से सम्बन्ध स्थापित किये। अकबर का जन्म भी उमरकोट के राणा वीरसाल के यहाँ हुमाँयु की पत्नी हमीदाबानो के गर्भ से हुआ था। उसका बचपन हिन्दू राजपूतों के मध्य ही गुजरा। अपने पिता की असमय मृत्यु के बाद पंजाब के कलनौर में 13 वर्ष की अवस्था में अकबर का राजतिलक हुआ और उसके बाद उसने छिन्न भिन्न मुग़ल साम्रज्य को संगठित कर अपना एक छत्र साम्राज्य स्थापित किया। वह जानता था कि उसके लिए सबसे बड़ी चुनौती वाला जो राज्य है वो राजपूताना ही है क्योंकि राजपूत अत्यंत ही महत्वकांक्षी थे और बाबर के विरूद्ध हुई खानवा के युद्ध में अपनी पराजय का बदला लेने को आतुर थे। 
     अधिकतर राजपूत राजाओं ने अकबर की शान्त और स्वायत्ता से संतुष्ट होकर आत्म समपर्ण कर दिया।  इन्हीं में आमेर के राजा भारमल नाम भी बड़े तबके के साथ लिया जाता है। उन्होंने मुगलों की आधीनता ही स्वीकार नहीं की बल्कि उनसे वैवाहिक संबंध भी स्थापित किये। राजा भारमल ने अपनी पुत्री जोधाबाई जिसे हरकाबाई के नाम से भी जाना जाता है का विवाह मुग़ल बादशाह अकबर के साथ किया। इसके बाद ही अकबर को राजपूतों पर अपना अधिपत्य स्थापित करने में आसानी हुई। हालांकि अनेक राजपूत ऐसे भी थे जिन्होंने अकबर की आधीनता कभी स्वीकार नहीं की जिनमे मेवाड़ के शासक महाराणा प्रताप का नाम शिरोमणि है। 

     जोधाबाई एक हिन्दू राजपूत स्त्री थी। मुगलों के बीच रहकर भी उसने कभी अपना हिंदुत्व नहीं त्यागा। उसने सम्राट अकबर की पत्नी होने के सारे फ़र्ज़ अपने धर्म के साथ ही निभाए थे। हिंदुस्तान की मलिका होने के बाबजूद भी उसमें कभी अहम की भावना नहीं थी जबकि अकबर की अन्य पत्नियाँ उससे द्धेष की भावना रखती थीं क्योंकि उसके व्यक्तिगत स्वभाव और व्यवहार के कारण अकबर उसे अपनी सबसे प्रिय रानी के रूप में देखता था। जोधाबाई ने अपने जीतेजी और मरने के बाद भी दोनों धर्मों को पूरी निष्ठा से निभाया। 

      जहाँगीर की आत्मकथा तुजुके जहाँगीरी में जोधाबाई के नाम के स्थान पर मरियम उज़ ज़मानी के नाम से जाना गया है। जोधाबाई की मृत्यु उपरांत हिन्दू होने के कारण उनका दाह संस्कार किया गया था, जिस स्थान पर उनका दाह संस्कार हुआ वहां राजपूत होने के कारण उनकी छतरी का निर्माण किया गया। यह स्थान आज भी आगरा के अर्जुन नगर में स्थित है और मुग़ल बेग़म होने के कारण उनका मकबरा, अकबर के मकबरे से कुछ दूर आगरा - दिल्ली राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित है जिसे मरियम के मकबरे के नाम से जाना जाता है। 

मरियम का मकबरा 

MARIAM TOMB

SUDHIR UPADHYAY AT MARIYAM TOMB

MARIAM TOMB

MARIAM TOMB

MARIAM TOMB

MARIAM GRAVE

MARIAM TOMB

MARIAM TOMB


MARIAM TOMB

MARIAM TOMB

MARIAM TOMB

MARIAM TOMB


MARIAM TOMB

MARIAM TOMB

Friday, June 29, 2018

KGM TO MTJ - NADRAI BRIDGE


काठगोदाम से मथुरा - आखिरी पड़ाव नदरई पुल, कासगंज। 


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   सोरों देखने के बाद हम अपने आखिरी पड़ाव कासगंज पहुंचे। वैसे तो कासगंज कुछ समय पहले तक एटा जिले का ही एक भाग था परन्तु अप्रैल 2008 में इसे उत्तर प्रदेश का 71वां जिला बना दिया गया। बहुजन समाजवादी पार्टी के संस्थापक कांशीराम की मृत्यु वर्ष 2006 में हो गई थी उन्हीं की याद में उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री सुश्री मायावती ने इसे कांशीराम नगर के नाम से घोषित किया गया। कासगंज पूर्वोत्तर रेलवे का एक मुख्य जंक्शन स्टेशन है जहाँ से बरेली, पीलीभीत, मैलानी तथा फर्रुखाबाद, कानपुर और लखनऊ के लिए अलग से रेलवे लाइन गुजरती हैं। हालाँकि कासगंज गंगा और यमुना के दोआब में स्थित होने के कारण काफी उपजाऊ शील जिला है यहाँ की मुख्य नदी काली नदी है। 

पर्यटन दृष्टि से कासगंज में नदरई का पुल विशेष दर्शनीय है। ब्रिटिश शासन काल में सन 1885 में इस विशेष पुल का निर्माण होना शुरू हुआ और चार साल के अंतराल में यह बनकर पूरा हुआ। इस पुल की खास विशेषता यह है कि इस ब्रिज के नीचे अगर नदी बहती है तो ऊपर बहती है अति वेगवान हजारा गंग नहर। यानी नीचे भी नदी और ऊपर भी नदी। ऐसा कोई और पुल शायद ही हिंदुस्तान में कहीं हो। कला की दृष्टि यह पुल आज हमारी ऐतिहासिक धरोहर में शामिल है। हजारों युवा प्रतिदिन यहाँ आकर इसे देखते हैं और सेल्फियाँ लेते हैं। 

दरअसल ब्रिटिश शासन काल में कासगंज में सिंचाई हेतु केवल काली नदी ही एकमात्र विकल्प था जिससे हमेशा पानी का अभाव रहा करता था। लोगो की समस्या और पानी के अभाव को दूर करने के लिए ब्रिटिश हुकूमत ने ऊपरी गंग नहर का निर्माण शुरू किया। जब यह नहर कासगंज पहुंची तो सामने काली नदी परेशानी बनकर खड़ी हो गई। अब इसे कैसे पार किया जाए, तब ब्रिटिश सरकार ने इस पुल का निर्माण आरंभ किया और काली नदी के ऊपर इस ब्रिज को बनाकर हजारा नहर को इसके ऊपर से निकाला। इसे झार का पुल भी कहा जाता है। इतने वर्ष व्यतीत होने के बाद भी यह पुल अपनी मजबूती के साथ खड़ा है। यह वास्तव में उत्कृष्ट कला का एक नमूना है। 

इस पुल के बीच बीच में कोठरियों का निर्माण भी हुआ है जिनमें बनी सीढ़ियों के आधार पर नीचे जाने का रास्ता भी था, आजके समय में इन्हें चोर कोठरियों के नाम से भी जाना जाता है। वास्तव में इस पुल को और इस पर बहने वाली नदी और नहरों की अविरल छटा देखते ही बनती है। एकबार इसे देखने के बाद आप जीवन भर इस ब्रिज की यादों को कभी भुला नहीं पायेंगे। तो फिर इसबार झोला उठाइये और उत्तर प्रदेश के कासगंज आ जाइये। कासगंज - मथुरा रोड पर हज़ारा नहर के समीप ही आप इस ब्रिज को देख सकते हैं और इसके बाद आप  यहीं से बस पकड़कर सोरों और कछला के दर्शन भी कर सकते हैं। 

इस पुल को देखने के बाद मैं और कल्पना मथुरा की तरफ रवाना हो गए। अगसौली नामक स्थान पर एक प्राकृतिक वातावरण से भरपूर ढाबे पर हमने भोजन किया। यह स्थान कल्पना को बहुत ही पसंद आया इसकलए बाद अब हमारा घर ज्यादा दूर नहीं था। हाथरस, बिचपुरी होते हुए शाम  को साढ़े पांच बजे तक मैं अपने घर पहुँच गया।  इस प्रकार मेरी नैनीताल बाइक यात्रा समाप्त होती है।

नदरई पुल , कासगंज 

हजारा नहर, नदरई पुल कासगंज 

इसे झाल का पुल भी कहते हैं 


काली नदी 


पुल के नीचे बहती काली नदी 





SUDHIR UPADHYAY ON NADRAI BRIDGE 


A DHABA IN AGSOULI 
{{{ धन्यवाद }}} 

KGM TO MTJ - SORON


काठगोदाम से मथुरा - सोरों शूकर क्षेत्र

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     गंगा स्नान के बाद हमारा अगला पड़ाव सोरों शूकर क्षेत्र था।  इस क्षेत्र को शूकर क्षेत्र इसलिए कहते हैं क्योंकि यहाँ भगवान विष्णु के दूसरे अवतार श्री वराह भगवान का प्रसिद्ध मंदिर स्थित है। भगवान विष्णु ने पृथ्वी को दैत्यराज हिरण्याक्ष से बचाने के लिए ब्रह्मा जी की नाक से वराह के रूप में प्रकट होकर पृथ्वी की रक्षा की थी। जब दैत्यराज हिरण्याक्ष पृथ्वी को समुद्र के रसातल में छुपा आया तब भगवान वराह ने अपनी थूथनी की सहायता से पृथ्वी का पता लगाया और समुद्र में जाकर हिरण्याक्ष का वध करके पृथ्वी को अपने दाँतों पर रखकर बाहर आये।

     समस्त देवी देवताओं और ऋषि मुनियों ने उनकी श्रद्धा पूर्वक स्तुति की। इसके बाद भगवान वराह ने अपने खुरों से जल स्तंभित कर पृथ्वी को स्थापित किया। कहते हैं सोरों ही वह स्थान है जहाँ देवताओं और ऋषि मुनियों ने उनकी स्तुति की और साथ ही विनती की कि वह सदा के लिए उनके इस स्थान पर निवास करें। तभी से यह स्थान शूकर क्षेत्र ने नाम से विख्यात हुआ। पौराणिक कथाओं के अनुसार सृष्टि के आदि में सर्वप्रथम पृथ्वी का आविर्भाव यहीं हुआ था। यहाँ वराह भगवान् की पुण्य स्मृति में मेला विशाल मेला भी लगता है। 

      हम जब यहाँ पहुंचे तब तक वराह भगवन का मंदिर बंद हो चुका था। सोरों शुरू से ही धार्मिक तीर्थ स्थल रहा है यहाँ अनेकों ऋषि मुनि तपस्या में लीन रहते थे। यह स्थान गंगा के निकट होने के कारण शुरू से ही हरा भरा और प्राकृतिक वातावरण से भरपूर रहा है। गंगा की कई धाराएं यहाँ से होकर गुजरती जिनमें बूढी गंगा या हाड़ गंगा प्रमुख हैं इसी कारण लोग यहाँ गंगा की धारा में स्नान कर अपने पितरों का श्राद्ध तर्पण भी करते हैं। यहाँ महाप्रभु वल्लभाचार्य जी की बैठक भी दर्शनीय है। अनेकों मंदिरों से भरपूर सोरों एक प्रमुख नगर और दर्शनीय तीर्थ स्थल है।

     कुछ देर घूम फिर कर मैं और कल्पना वापस मथुरा की रतफ रवाना हो चले।  दोपहर के २ बज चुके थे और अब भूख लगने का समय भी हो चला था। मैंने  कल्पना से इस बारे में राय ली तो उसका उत्तर हाँ में था।  अब हमें किसी अच्छे ढाबे की तलाश थी जहाँ कुछ देर रूककर आराम किया जा सके। 

GOD VARAH 


OLD GANGA IN SORON

SORON KUMBH STHAL

SORON

MY WIFE KALPANA UPADHYAY

BHAGIRATH TEMPLE IN SORON

ANCIENT SORON

RUINS OF SORON FORT

SORON FORT

GOD VARAH TEMPLE

SORON

GANGA IN SORON

GANGA IN SORON

SORON TEMPLE

GOD VARAH CIRCLE IN SORON

SHRI VARAH BHAGWAN
    अगली यात्रा - काठगोदाम से मथुरा, नदरई पुल। 

KGM TO MTJ - KACHHLA GHAT


काठगोदाम से मथुरा - कछला घाट 

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      कछला घाट पहुंचकर देखा तो रेलवे ने अपना वाला पुराना मार्ग बंद कर दिया है जहाँ से कभी रेलमार्ग और सड़कमार्ग एक होकर गंगा जी को पार करते थे। सड़क मार्ग अलग हो गया, मीटरगेज मार्ग भी बंद हो गया परन्तु पब्लिक है कि आज भी रेलवे के बिज के नीचे ही गंगा जी में नहाना पसंद करती है।  लोग आज भी अपनी उस आदत को नहीं बदला पाए जिसपर वर्षों से वे और उनके पूर्वज चलते आ रहे थे।  इसलिए जब रेलवे ही बदल गई तो मजबूरन लोगों की रेलवे ब्रिज की तरफ जाने की आदत को रेलवे ने ब्लॉक् कर दिया। अब मजबूरन लोगों को कछला नगर की तरफ से होकर ही गंगाजी में स्नान करने जाना पड़ता है और हमें भी जाना पड़ा। 

      जब पहली बार एवेंजर गंगाजी में उतरी तभी हवाओं ने हमारी तरफ अपना रुख कर दिया और गंगाजी में बालू को उड़ाती हुई हमारा मार्ग रोक दिया। पर यह भी एवेंजर थी और साथ में लगा स्टुड का हेलमेट जिससे इन हवाओं का हमपर कोई फर्क नहीं पड़ा। हम रेलवे ब्रिज के नीचे पहुंचे और बीच गंगा में जाकर मैंने बाइक को गंगा की धारा के किनारे खड़ा कर दिया। जब माँ गंगा सामने थी और हम सुबह से नहाये हुए भी नहीं थे तो फिर सब्र कैसा तुरंत गंगा जी को प्रणाम कर छलांग लगा दी। और जी भरकर आज गंगा स्नान का लुफ्त उठाया।  कल्पना को शुरुआत में डर अवश्य लगा किन्तु एकबार गंगाजी में प्रवेश करने के बाद उसका भी सारा डर समाप्त हो गया।  जी भरकर गंगा की गोदी में स्नान किया। 

     नहाने के पश्चात मैंने अपनी बाइक एवेंजर को गंगा स्नान कराया और अपने कपडे बदलकर तैयार हो गया। अब सूर्य देवता ठीक सिर के ऊपर थे मतलब बारह बज चुके थे। हवाओं का रुख भी अब काफी तेज हो चुका था इसलिए हम गंगाजी को प्रणाम कर वापस अपनी मंजिल की तरफ बढ़ चले। अगला पड़ाव हमारा सोरों था जो कि एक महत्वपूर्ण तीर्थस्थान कहलाता है।  अगले भाग में पढ़िए। 

KALPANA BATHING IN GANGA RIVER

AVENGER STAND AT BANK OF GANGA 

MY BIKE AVENGER AT GANGA 

AVENGER

MY WIFE KALPANA UPADHYAY 


SUDHIR UPADHYAY AT GANGA

TRAIN PASSING ON BRIDGE OVER GANGA RIVER AT KACHHLA

KACHHLA BRIDGE OVER GANGA RIVER

KACHHLA GHAT

अगली यात्रा -  काठगोदाम से मथुरा, सोरों शूकर क्षेत्र।