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Monday, October 23, 2017

MANIYAR MATH


मनियार मठ 

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      जरादेवी मंदिर आगे चलकर सोन भंडार गुफा की तरफ जाते वक़्त रास्ते में मनियार मठ पड़ता है। यूँ तो यह आज एक बौद्धिक स्थल है परन्तु इसका इतिहास आजतक स्पष्ट नहीं हो सका है। जैन धर्म के अनुसार यह विदेह ( वैशाली ) की राजकुमारी और अजातशत्रु की माँ रानी चेलन्ना का कुंआ है जो उस समय में निर्माण कूप कहलाता है। इसका निर्माण गोलाकार ईंटों से हुआ है। कुछ ग्रंथों में इसे बुद्ध का स्तूप भी कहा जाता है परन्तु यह इसे देखने के बाद सच नहीं लगता क्योंकि इसकी सरंचना एक कुएँ के प्रकार की है और वास्तव में यह एक कुँआ ही है।

JARA TEMPLE


जरासंध और ज़रा देवी मंदिर


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      सप्तपर्णी गुफा देखने के बाद मैं वापस पर्वत से नीचे आया और आगे बढ़ने लगा। एक तांगे वाले बाबा से अन्य स्थलों को घुमाने के लिए 200 रूपये में राजी किया। और तांगे में बैठकर में राजगीर की अन्य प्राचीन धरोहरों को देखने के लिए निकल पड़ा, इस समय देश में हर जगह पर्यटन पर्व चल रहा था। यह मेरी ऐतिहासिक और पौराणिक स्थल भ्रमण यात्रा थी। ताँगे वाले सबसे पहले ज़रा देवी के मंदिर पहुंचे और मंदिर से निकलने के बाद उन्होंने जरासंध और ज़रा देवी की कथा शुरू की।

SAPTPARNI CAVE



वैभारगिरि पर्वत और सप्तपर्णी गुफा 

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ब्रह्मकुंड में स्नान करने के बाद मैं इसके पीछे बने पहाड़ पर चढ़ने लगा, यह राजगीर की पांच पहाड़ियों में से एक वैभारगिरि पर्वत है जिसे राजगीर पर्वत भी कहा जाता है। कहा जाता है कि इसी पर्वत पर वह ऐतिहासिक गुफा स्थित है जहाँ अजातशत्रु के समय प्रथम बौद्ध संगीति का आयोजन हुआ था। इसे सप्तपर्णी गुफा कहते हैं। माना जाता है प्रथम बौद्ध संगीति महात्मा बुद्ध के महापरिनिर्वाण के अगले वर्ष मगध सम्राट अजातशत्रु द्वारा राजगृह की सप्तपर्णी गुफा में आहूत की गई जिसमे 500 से भी अधिक बौद्ध भिक्षुओं ने भाग लिया था तथा जिसकी अध्यक्षता महाकश्यप द्वारा की गई। 
इसी के साथ ही यहाँ जैन सम्प्रदाय के कुछ पूजनीय मंदिर भी स्थित हैं। और इनके अलावा एक महादेव का मंदिर भी इस पर्वत स्थित है। इसप्रकार यह पर्वत तीनों धर्मो के लिए विशेष महत्त्व रखता है।

BRAHMKUND


ब्रह्मकुंड - गर्मपानी का कुंड 


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            अजातशत्रु के किले से थोड़ा आगे चलने पर राजगीर पर्वत दिखाई देता है, यह पर्वत गिद्धकूट पर्वत के ठीक सामने है। राजगीर पर्वत को वैभारगिरि पर्वत भी कहते हैं। राजगीर में ऐसे पांच पर्वत हैं जो जैनियों के धार्मिक स्थल हैं। महावीर स्वामी और जैनधर्म के अन्य अनुयायिओं से जुड़े यह पर्वत आज भी जैन धर्म की व्याख्या करते नजर आते हैं। राजगीर पर्वत के नीचे ही गरमपानी के कुंड हैं। इन्हे ब्रह्मकुंड कहा जाता है। हिन्दू धर्म में इस कुंड का अत्यधिक महत्त्व है। अभ्रक, गंधक से युक्त ब्रह्मकुंड का पानी गर्म होता है और चर्मरोग में काफी लाभदायक होता है।

AJATSHATRU FORT


अजातशत्रु का किला 

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राजगीर रेलवे स्टेशन से बाहर निकलकर मैं राजगीर शहर में आया, सुबह सुबह ही पैदल अजातशत्रु के किले तक पहुंच गया । यह किला, गया - मोकामा राजमार्ग 82 पर स्थित है। यह किला पूर्ण रूप से ध्वस्त हो चुका है अब केवल इसकी बाहरी दीवारों के अवशेष ही शेष हैं, किले के अंदर जहाँ किसी ज़माने में राज महल हुआ करते थे उस जगह अब केवल वर्तमान में मैदान ही बचे हैं किसी भी राजमहल के अवशेष अब यहाँ देखने को नहीं मिलते हैं। किले के रूप में इसकी चारदीवारी ही शेष बची है जो इसके किसी समय में विशालकाय होने का संकेत देती है।


RAJGIR


   राजगीर या राजगृह - एक पर्यटन यात्रा 

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मेरी ट्रेन सुबह ही राजगीर पहुँच गई थी, जनरल कोच की ऊपर वाली सीट पर मैं सोया हुआ था, एक बिहारिन आंटी ने मुझे नींद से उठाकर बताया कि ट्रेन अपने आखिरी स्टेशन पर खड़ी है। मैं ट्रेन से नीचे उतरा तो देखा एक बहुत ही शांत और खूबसूरत जगह थी ये, सुबह सुबह राजगीर की हवा मुझे एक अलग ही एहसास दिला रही थी कि मैं रात के चकाचौंध कर देने वाले गया और पटना जैसे शहरों से अब काफी दूर आ चुका था। हर तरफ हरियाली और बड़ी बड़ी पहाड़ियाँ जिनके बीच राजगीर स्थित है। यूँ तो राजगीर का इतिहास बहुत ही शानदार रहा है, पाटलिपुत्र ( पटना ) से पूर्व मगध साम्राज्य की राजधानी गिरिबज्र या राजगृह ही थी जिसका कालान्तर में नाम राजगीर हो गया।

BUDDH POORNIMA EXPRESS



बुद्धपूर्णिमा एक्सप्रेस - गया से पटना और राजगीर

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         रोहतासगढ़ से लौटने के बाद मैं डेहरी ऑन सोन स्टेशन पर आ गया था, यहाँ से गया जाने के लिए मुझे झारखण्ड स्वर्णजयंती एक्सप्रेस मिल गई और सोन नदी पुल पार करके मैं गया पहुँच गया। गया पहुँचने तक मुझे शाम हो चुकी थी, स्टेशन पर उतरकर मुझे अनायास ही एहसास हुआ कि यह एक तीर्थ स्थान है और मुझे माँ को यहाँ लेकर आना चाहिए था। स्टेशन से बाहर निकलकर मैं बाजार पहुंचा और विष्णुपद मंदिर की तरफ रवाना हो गया। काफी चलने के बाद जब मैं थक गया तो एक हेयर सैलून में अपने बाल कटवाने पहुँच गया। बाल कटवाने के बाद मैं फिर से विष्णुपद मंदिर की तरफ रवाना हुआ फिर मन में सोचा कि अब रात भी हो चुकी है और पटना जाने वाली ट्रेन का समय भी होने वाला है, किसी दिन माँ के साथ ही आऊंगा तभी विष्णु जी के दर्शन भी हो जायेंगे और फल्गु नदी को भी देख लेंगे इसके अलावा बौद्ध गया का मंदिर भी देख लेंगे, अभी गया घूमने का उपयुक्त समय नहीं है इसलिए बिना दर्शन किये ही वापस स्टेशन आ गया।

Sunday, October 22, 2017

ROHTASGARH ROAD




रोहतासगढ़ की तरफ एक यात्रा 


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     सुबह दस बजे के करीब मैं वापस सासाराम स्टेशन आ गया, अब मुझे रोहतास के किले को देखने जाना था, रोहतास जाने के लिए डेहरी होकर जाना पड़ता है और डेहरी जाने के लिए ट्रेन ही सर्वोत्तम है जो दस मिनट में सासाराम से डेहरी पहुंचा देती है। स्टेशन पर दीक्षाभूमि एक्सप्रेस आ रही थी जो अगले स्टेशन देहरी जाने के लिए तैयार थी। कुछ ही देर बाद मैं डेहरी स्टेशन  पर था। यहाँ स्टेशन के बाहर लगे बोर्ड पर रोहतास के किले को देखकर मन और भी रोमांचित हो उठा।

SHERSHAH SURI TOMB - SASARAM



शेरशाह सूरी और उसका मक़बरा 

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बिहार की ऐतिहासिक धरती पर इतिहास को खोजते हुए मैं, इतिहास के महान शासक शेरशाह सूरी तक जा पहुँचा जिसने अपने शासन काल में भारतीय इतिहास के सबसे बड़े और विशाल साम्राज्य  'मुग़ल साम्राज्य ' को छिन्न भिन्न कर दिया। बाबर द्वारा स्थापित मुग़ल साम्राज्य की जमीं नींव को उखाड़ फेंकने और दिल्ली की गद्दी पर किसी मुग़ल शासक को हटाकर खुद दिल्ली का शासक बनने और मुग़ल वंश को हटाकर सूरी वंश की स्थापना करने का श्रेय महान शासक शेरशाह सूरी को ही जाता है।

TARACHANDI DEVI - SASARAM



माँ ताराचंडी देवी शक्तिपीठ धाम

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           मैं रात दो बजे सासाराम स्टेशन उतर गया था, यहाँ आकर स्टेशन पर बने एक बोर्ड पर मैंने देखा कि यहाँ ताराचंडी देवी का शक्तिपीठ धाम है। सासाराम के बारे में कहा जाता है कि यह महान ऋषि परशुराम की भूमि है। सहस्रराम, सहसराम, सासाराम = परशुराम। रात को तो  स्टेशन पर बने ब्रिज पर मैं सो गया परन्तु सुबह पांच बजे में उठकर देवी ताराचंडी की तरफ निकल गया। स्टेशन से इस दिव्यधाम की दूरी मात्रा पांच किमी ही है सोचा था पैदल ही नाप दूंगा।

Friday, October 20, 2017

BIHAR


अबकी बार - बिहार 


         घूमने का जज़्बा दिल में हो तो मंजिलें मिल ही जाती हैं, बस जरुरत है तो उनतक पहुँचने की। मेरे भी मन में कुछ ऐसी मंजिलें थी जहाँ तक मैं पहुंचना चाहता था। सो इस दीपावली पर ठान लिया था कि जरूर जाऊँगा अबकी बार बिहार। इस बार अकेला ही था कोई साथ में जाने वाला नहीं था इसलिए रिजर्वेशन की आवश्यकता ही नहीं पड़ी। साधना को गोवर्धन पूजा वाले दिन ही बुला लिया था ताकि भाई दौज का त्यौहार मना सकूँ। दौज को सुबह पांच बजे निधि और साधना भाई दौज पूरी की और माँ का आशीर्वाद लेकर सुबह साढ़े पाँच बजे अकेला ही निकल पड़ा अपने देश के इतिहास और संस्कृति को देखने के लिए ऐतिहासिक राज्य बिहार की तरफ।

Wednesday, March 30, 2016

NEWDELHI TO JAYNAGAR



स्वतंत्रता सैनानी एक्सप्रेस से एक सफर 


अयोध्या की यात्रा के पश्चात् इस बार मेरा मन मिथिला की ओर जाने का था । मिथिला भगवन श्री राम की ससुराल तथा माता सीता की जन्मस्थली है । मिथिला का आधा भाग आज भारत में है और आधा भाग नेपाल में । मिथिला राजा जनक के राज्य का नाम था , तथा अवध राजा दशरथ के राज्य का नाम । मिथिला की राजधानी जनकपुर थी जो आज नेपाल में है । तो बस इसबार नेपाल की तरफ ही जाना था । सहयात्री के रूप में इसबार माँ को चुना और स्वतंत्रता सैनानी में नई दिल्ली से जय नगर तक रिजर्वेशन करवा लिया । जयनगर नेपाल के सीमा पर स्थित आखिरी भारतीय रेलवे स्टेशन है और बिहार के मधुबनी जिले के अंतर्गत आता है ।
मथुरा जंक्शन से यात्रा प्रारम्भ करते है और दिल्ली की और चलते हैं । वहां से स्वतंत्रता सैनानी रात को ८:२० पर चलेगी ।