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Thursday, March 7, 2002

आयराखेड़ा ग्राम की एक बारात

   

आयराखेड़ा ग्राम की एक बारात


     काफी पुरानी बात है जब मैं हाई स्कूल में था और मेरी बोर्ड के एग्जाम नजदीक थे। मेरा आज साइंस का प्रेक्टिकल था। लैब में मुझसे एक वीकर और एक केमिकल की बोतल फूट गई जिस कारण सर ने मुझे तोड़ दिया। सजा पाकर थका हारा जब मैं घर पहुंचा तो माँ ने याद दिलाया कि आज मेरी दूर की मौसी की शादी है इसलिए मुझे आयराखेड़ा जाना पड़ेगा मैंने घडी में देखा तो दोपहर के डेढ़ बजे थे यानी आगरा कैंट से मथुरा के किये कोई ट्रेन नहीं थी ।

       आयरा खेड़ा मेरी माँ का गाँव है जो मथुरा कासगंज रेल मार्ग पर स्थित राया स्टेशन से पांच किलोमीटर दूर है। आयराखेड़ा गाँव का नाम सरकारी कागजों में बिन्दुबुलाकी है, अतः गूगल मैप में भी इसे बिन्दुबुलाकी के नाम से ही खोजा जा सकता है। मुझे याद आया कि आगरा फोर्ट से मथुरा के लिये एक ट्रेन है जिसका नाम है गोकुल एक्सप्रेस ।

     यह एक मीटर गेज ट्रेन है जो आगरा फोर्ट से गोंडा के बीच चलती है और मेरी पसंदीदा ट्रेन है क्योंकि यह मेरे रिश्तेदारों के गांवो से होकर गुजरती है । इस ट्रेन का छूटने का समय २ बजे था इसलिए मैं जल्द तैयार होकर ईदगाह स्टेशन पहुँच गया और ट्रेन में बैठ गया । हालाँकि आज मेरा मूड़ ठीक नहीं था इसलिए मैं ऊपर वाली सीट पर सो गया ।

     जब मेरी आँख खुली तो ट्रेन मथुरा स्टेशन पर खड़ी थी। यद्धपि मैं जानता था कि ये ट्रेन राया नहीं रुकेगी, फिर भी मैं बैठा रहा क्योंकि मेरे पास समय बहुत कम था मैंने सोचा शायद रुक जाए, भाग्य आजमाने में क्या जाता है। मेरा अंदाजा गलत था ट्रेन राया पार कर चुकी थी । हमारे रेल चालकों की एक खास बात ये है कि स्टेशन से पहले ट्रेन जैसी चले चलातें हैं पर जब कोई बिना स्टॉप वाला स्टेशन आता है तो गाड़ी की स्पीड और दुगनी कर देते हैं । ऐसा ही गोकुल एक्सप्रेस के चालक महोदय ने किया , राया आते ही ट्रेन की स्पीड दुगुनी, गाड़ी धुल उडाती हुई राया को पार कर रही थी ।

      राया से कुछ किमी आगे एक गाँव पड़ता है नाम है बिरहना । यहाँ एक बार गोकुल एक्सप्रेस का एक्सीडेंट भी हो गया था जिससे ट्रेन को अपने दो डिब्बे खोने पड़े थे हालांकि ज्यादातर लोग घायल ही हुए थे ,मरा  कोई नहीं था। तब से यह ट्रेन इस गाँव के बीचोंबीच से धीरे होकर गुजरती है । गाड़ी की इस रफ़्तार का मैंने भरपूर फायदा उठाया और चलती ट्रेन से कूद पड़ा एक घूरे के ढेर पर । गाँव में कूड़ेदान के ढेर को घुरा कहते हैं ।
ब्रजभाषा जो ठहरी । ट्रेन से कूदकर मैं सड़क पर पहुंचा तो गाँव वाले मुझे ऐसे देख रहे थे जैसे मैं कोई बहादुरी का काम करके आ रहा हूँ या यूँ कहिये की उन्हें फ्री में एक स्टंट देखने को मिल गया ।

      रफ़्तार ज्यादा धीमी होने के कारण ही मैं कूद पाया था वर्ना किसकी मजाल जो बिना ट्रेन की मर्जी के उतर भी सके । यहाँ से आयराखेडा तीन किमी की दूरी पर था मैं पैदल ही अपनी माँ के गाँव की ओर चल पड़ा । मैं थोडा आगे ही बढ़ा था कि मुझे एक ट्यूब बैल नजर आया जिसमे शुद्ध व् मीठा पानी गूलों में होकर खेत में जा रहा था । यहाँ से आयरा खेड़ा दो किमी था और मुझे प्यास भी लग आई थी इसलिए पहले हाथ मुँह धोये और फिर जी भर कर पानी पिया सारे दिन की थकान दूर हो गई । मन तो नहाने का भी था पर इतना समय नहीं था , मुझे बारात के पहले पहुंचना था इसलिए चल दिया गाँव की ओर ।

       गाँव में पहुंचकर जैसे ही मैं अपने मामा जी की गली में मुड़ा, मुझे सामने मीरा मौसी खड़ी मिली । मीरा मौसी मुझसे एक साल बड़ी है और मेरी माँ की चचेरी बहिन है । उनमे और मुझमे हमेशा से ही तकरार रहती है
क्योंकि वो खुद को मुझसे ज्यादा होशियार समझती हैं और मैं स्वयं को । साथ ही खड़ी थी  उनकी मित्रगण . जिनसे मैं सदा दूर ही रहता हूँ, सीधी  बात को उलटी बनाकर पेश करती हैं ।

        बारात आने में देर थी और मुझे भूख भी लगी थी । इस गाँव का एक रूल है कि जब तक बारात खाना न खा ले तब तक कोई और भी नहीं खा सकता फिर चाहे वो कोई भी हो । तो दावत तो अभी मिलने से रही , मैं पहुंचा अपने छोटे मामा के यहाँ , यहाँ मुझे मेरी छोटी मामी मिली जिनका नाम है सीमा, आगरे के पास मितावली की हैं । मैंने कहा मामी चाय बना दो आखिरकार मैं आपके यहाँ मेहमान हूँ तो बदले में जबाब मिला कि  तुम पड़ोस ( मीरा मौसी का घर, जिनकी बहिन की आज शादी थी ) के मेहमान हो वहीँ जाकर  चाय पीजिये ।

       मैंने कुछ नहीं कहा और बातो ही बातों में मामी चाय भी बना लाई । मुझे उनका यह अंदाज पसंद आया ।
परन्तु चाय से पेट तो नहीं भरता पर ये है कि थोड़ी देर के लिए भूख शांत हो जाती है ,आज मेरे दोनों मामाओ
के यहाँ कुछ नहीं बना था सुबह से दावत जो चल रही थी , अब शाम की दावत की तैयारियां थी ।

     बारात आते ही पूरे नोहरे पर हल्ला मच गया बारात आ गई, बारात आ गई । जिस गली में मेरे मामा रहते हैं वो बंद है और वहां चार ही घर हैं चारो मेरे मामाओ के और इसी गली को गाँव में नोहरा कहते हैं । मेरी माँ के दो चाचा थे ,दो घर उनके और वाकी मेरे दोनों मामाओ के ।

       मैं बारात देखने पहुंचा तो देखा बारात स्कूल पर नाश्ता कर रही है , स्कूल पर .... जी हाँ , स्कूल पर , जब भी कोई बारात इस गाँव में आती ही तो सबसे पहले वो यही ठहरती है यहाँ बाराती नास्ता करते हैं और बारात  यही से चढती हुई गाँव का चक्कर लगाकर बेटी वाले के दरवाजे पर पहुँचती है । मैं भी पहुँच गया बरात देखने स्कूल पर , देखा मेरे मामा जी बारातियों को नास्ता दे रहे हैं । उनके एक मित्र ने जिनका नाम गोराबाबू है मुझे बुलाया और एक नास्ते की प्लेट मेरे हाथ में पकड़ा दी, मैंने कहा मैं बाराती तो हूँ नहीं तो जबाब मिला बाराती न सही नातेदार तो हो । मुझे उनका उत्तर सुनकर बड़ी ख़ुशी हुई और आखिर सही भी तो है कभी मेरे पापा की भी बारात इस गाँव में आई थी ।

      नास्ता करके सीधा मैं घर पहुंचा तो देखा बारात के स्वागत की तैयारी चल रही थी , मैंने अपने मौसेरे भाई गोपाल से पुछा , यार टेंट कहाँ लगा है कुर्सी मेज भी नहीं दिख रही । उसने बताया की यहाँ टेंट नहीं लगा तो  मैंने आश्चर्य से पूछा कि बाराती खाना कहाँ खायेंगे , उसने छत की तरफ इशारा करके कहा ऊपर । ऊपर मतलब छत पर । मुझे यह जानकार बड़ा आश्चर्य हुआ । मैंने उससे कहा जमीन पर बैठकर, उसने उत्तर दिया इसमें बुराई क्या है और खाना तो जमीन पर बैठकर ही खाने में आनंद है । उसकी बात बेशक सही थी पर मेरे लिए उचित नहीं ।

      आख़िरकार दावत का नंबर आया और अपने ममेरे भाई धर्मेन्द्र शर्मा  के साथ में दावत में बैठ गया ।  रायता ,सब्जी पूरी ,तीन तरह की मिठाई और भी बहुत कुछ पर हाँ एक अलग चीज जो मुझे आगरा में नहीं मिलती थी नाम था दही बूरा । वाह मजा आ गया खाना खाकर ।

     खाना खाकर मैं टहलने निकल गया, मैं शादियों में सिर्फ दावत तक ही आनंद लेता हूँ उसके बाद शादी मेरे लिए ख़त्म हो जाती है, अब मुझे नींद आ रही थी, सभी बारात के स्वागत में व्यस्त थे। शादी वाले घरों में ज्यादातर सोने के लिए जगह खुद ही तलाशनी पड़ती है । मैं गया बड़े मामा के घर, चारपाई तो थी नहीं सभी बारातियों के लिए बुक जो थीं।

बिस्तर और तकिया उठाया और छत पर चला गया , यहाँ देखा तो सब उलटे सीधे पड़े थे , सोने को तो क्या चलने को भी जगह नहीं थी। रोहित का पैर पदु वाली मौसी के बच्चों के ऊपर रखा था और चिंटू का दिल्ली वाली रूबी के ऊपर ।

      मैंने सोचा अपने तो चांस ही नहीं हैं यहाँ सोने के, सामने देखा तो छत पर एक कमरा बना था जिसकी छत खाली पड़ी थी , खाली इसलिए क्योंकि इस पर चढ़ने के लिए सीढीयाँ  नहीं थी इसलिए कोई नहीं चढ़ा । हिम्मत करके मैं चढ़ गया तो देखा जीतू बॉस पहले से ही यहाँ लेटा पड़ा है जिसे मैं जाने कहाँ कहाँ नहीं देख आया था । मैं भी लेट गया जीतू के बगल में ।

       सुबह आँख खुली तो सूरज मेरा फ़ोटो खींच रहा था मतलब काफी देर का निकल आया था , मैंने देखा जीतू अभी तक लेटा ही है मैंने उसे जगाया, और हम नीचे आये । रोने की आवाजे आना शुरू हो गई यानी विदाई हो रही थी, मौसी आज पहली बार अपने घर जा रही थी, मीरा मौसी तो दहाड़ें मारमार कर रो रही थी, उसकी बहिन कम दोस्त जो विदा हो रही थी ।

        मैंने देखा कि सबकी आँखों में आंसू थे, मेरे मन में सवाल उठा कि इंसान जीवन में दो बार जरुर रोता है एक बार तब, जब कोई इंसान मरता है और दूसरा तब,  जब बेटी विदा होती है फर्क सिर्फ इतना है कि वो गम के आंसू होते हैं और ये ख़ुशी के ।

     मौसी तो विदा हो गई अब मुझे भी विदा हो लेना चाहिए था , आगरा से मेरे मामा के साले जिनका नाम योगेश है, वो भी आये थे अपनी बाइक से। उन्ही के साथ बाइक पर मैं भी आगरा आ गया ।

गोकुल एक्सप्रेस 

गोकुल एक्सप्रेस आगरा फोर्ट स्टेशन पर *

गोकुल एक्सप्रेस मथुरा स्टेशन पर*

राया रेलवे स्टेशन 
महादेवी शर्मा ,  मेरी नानी
मीरा मौसी , अब इनकी भी शादी हो चुकी है 

ग्राम आयराखेड़ा 


आयराखेड़ा गाँव 

आयराखेड़ा






शादी के बाद मौसी का घर 


गोकुल एक्सप्रेस दुर्घटना ग्रस्त*


* उपरोक्त फ़ोटो विषय की उपयोगिता हेतु गूगल से लिए गए हैं