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Friday, October 11, 2013

AGRA



आगरा की गलियों में

   आज न जाने क्यों अपना ही शहर घूमने का ख्याल दिल में आया, सोचा दूर दूर से लोग जिस शहर को देखने आते हैं उसी शहर को छोड़ हम दूसरी जगहों पर जाते हैं और पाते हैं कि एक बार आगरा आना इस इस देश के हर इंसान का सपना है, और हो भी क्यों ना जब स्वर्ग में जिस महल की बुनियाद रखी गई हो और मोहब्बत के नाम पर जिसे जमीं  पे उतारा गया हो और उसकी ताजगी के नाम पर उसे ताज महल पुकारा गया हो उसे कौन नहीं देखना चाहेगा । 
 
     पर आज मैं आपको ताजमहल नहीं, आगरा की उन जगहों पर जाऊंगा जहाँ शायद ही लोग जाना पसंद करते हैं, उन जगहों में सबसे पहले मेरी यात्रा वाहेगुरु का नाम लेकर आगरा के प्रसिद्द गुरुद्वारा, गुरु का ताल से प्रारम्भ करूँगा। 


  • गुरु का ताल - गुरुद्वारा        
       राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या - 2 पर आगरा से दिल्ली की तरफ जाने पर आगरा शहर से मात्र ३ किमी की दूरी पर स्थित गुरुद्वारा भारतीय इतिहास में काफी महत्त्व रखता है। 


GURU KA TAAL. AGRA

GURU KA TAAL, AGRA

GURU KA TAAL , AGRA

GURU KA TAAL, AGRA

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  • दिल्ली गेट - मुग़ल सम्राट अकबर के समय का स्थित आगरा से दिल्ली की ओर  मार्ग में आगरा शहर का उत्तरी दरवाजा दिल्ली द्वार स्थित है । वर्तमान में यह राजा की मंडी रेलवे स्टेशन के बाहर स्थित है । 


  
दिल्ली दरवाजा , आगरा 



ताजमहल 
यमुना नदी के बायें तट पर स्थित ताजमहल आगरा की ही नहीं बल्कि सारी दुनिया की सबसे खूबसूरत ईमारत है जो दो दिलों के अटूट प्रेम को अपनी सुंदरता के रूप में लगातार कई वर्षों से समेटे हुए है । प्रतिदिन हजारों पर्यटक इसकी सुंदरता को देखने के लिए दुनिया के कोने कोने से आते हैं और इसे देखकर अपने प्रेम को अनुभव करते हैं ।
स्थिति :-  ताजमहल जाने के लिए आगरा के हर कोने से रास्ता उपलब्ध है, आगरा कैंट रेलवे स्टेशन से इसकी दूरी लगभग आठ किमी है, आगरा कैंट रेलवे स्टेशन से ताजमहल जाने के लिए हर समय ऑटो उपलब्ध हैं । ताजमहल जाने के लिए आगरा कैंट के अलावा राजा की मंडी, आगरा किला और ईदगाह आगरा जंक्शन मुख्य रेलवे स्टेशन हैं । बस द्वारा भी ताजमहल पहुँचने के लिए आगरा में कई बस स्टैंड उपलब्ध हैं जिसमे आईएस बी टी , आगरा फोर्ट , और ईदगाह मुख्य हैं ।
इतिहास : - ताजमहल संगमरमर से बानी एक नायब खूबसूरत ईमारत है जो कि बादशाह शाहजहां ने अपनी बेगम मुमताज महल की याद में बनबाया था ।  कहा जाता है कि शाहजहां और मुमताज एक दुसरे के अत्यन्य प्रेमी थे, जो एक दुसरे से कभी अलग नहीं रहते थे इसीकारण जब शाहजहां का दख्खन युद्ध हुआ तो मुमताज महल भी उसके साथ थी । यहीं पर उसने अपने चौदहवें बच्चे को जन्म दिया जो भारतीय इतिहास में  जहाँआरा के नाम से जानी गई । पुत्री को जन्म देने के बाद मुमताज की तबियत बिगड़ती गई, कहावत है कि  उसने अपने मारने से पहले शाहजहां से यह वचन लिया कि वह उसकी कब्र पर उसी के समान अत्यंत खूबसूरत ईमारत का निर्माण करेगा जो उसके मरने के बाद भी उसके प्यार को जिन्दा रखेगा और साड़ी दुनिया को उसके प्रेम का सन्देश देगा ।