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Monday, July 29, 2013

SABALGARH


कुन्नु घाटी में एक रेल यात्रा 


    यूँ तो किसी नई जगह जाने का विचार मन में कई बार आता है पर पूरा कब हो जाए यह तो ईश्वर ही जानता है। मेरे मन में पिछले कई दिनों से ग्वालियर - श्योंपुर नेरो गेज रेल यात्रा का विचार बन रहा था पर साथ के लिए मुझे किसी का सहयोग नहीं मिल रहा था इसलिए विचार , विचार ही बन कर रह जाता था । पर इस बार मेरे मौसेरे भाई दीपक की वजह से मेरा इस रेल यात्रा का सपना पूरा हो गया। कैसे ? आगे जानिये ।

    दीपक और दिनेश मेरी मौसी के लड़के हैं और दोनों ही मुझसे छोटे हैं, दोनों ही ग्वालियर में नौकरी करते हैं । कल शाम को ही गाँव से ग्वालियर जाने के लिए आगरा आये थे, मैंने दीपक को इस रेल यात्रा पर चलने के लिए बताया, वह तुरंत चलने के लिए राजी हो गया । मैंने ग्वालियर से श्योंपुर जाने वाली ट्रेन का टाइम देखा सुबह 6:25  था यानी की हमें रात को तीन बजे ही किसी ट्रेन से ग्वालियर के लिए निकलना था, पर नींद का कोई भरोसा नहीं होता, सोते ही रह गए । सुबह आँख भी खुली तो घड़ी पांच बजा चुकी थी, अब तो ट्रेन मिलना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन था । यह एक मात्र ट्रेन थी जो ग्वालिअर से सुबह चलकर शाम को श्योंपुर  पहुँचती है। पर वो कहते है ना चाहो तो सब कुछ है आसान । बस यही बात दिमाग में आई और दिमाग ने काम करना शुरू कर दिया। अब आगे जानिये की यह ट्रेन मैंने कैसे पकड़ी ?

    मैंने पहले इस ट्रेन का पूरा रूट गूगल मैप  में देखा और फिर इसका टाइम रेलवे की वेबसाइट में । यह ट्रेन जोरा अलापुर सुबह साढ़े नौ बजे पहुंचती है जो मुरेना से केवल छब्बीस किमी दूर है। मैंने और दीपक ने मुरेना की एक टिकट ली और झाँसी पैसेंजर से सुबह साढ़े सात बजे मुरेना पहुँच गए। दिनेश सीधा ग्वालियर चला गया। मैं और दीपक मुरेना से बस पकड़कर सुबह नौ बजे तक जोरा पहुँच गए, छोटे से स्टेशन पर  पटरियों को देखकर दीपक को बड़ा आश्चर्य हुआ । मैंने यह पहले भी कई बार और जगहों पर देख रखी थीं । कुछ समय बाद हमारे सामने इस रेल लाइन की ट्रेन भी आ गई, यह मैंने भी पहली बार ही देखी थी। इस ट्रेन को देखकर मैं भी हैरान रह गया, ट्रेन की छत पर तो क्या इसके इंजन की छत पर भी लोगों ने अपना स्थान बना रखा था ।

    ट्रेन के अन्दर तो क्या छत पर भी पैर रखने की जगह नहीं थी, बड़ी मुश्किल से मैं और दीपक ट्रेन के गार्ड के कोच की छत पर चढ़ गए। हालाँकि मैं जानता था कि यह मेरे और रेलवे के कानून के हिसाब से गलत है पर मजबूरी का दूसरा नाम ही महत्मा गाँधी है। जिस ट्रेन में यात्रा का सपना लिए आगरा से यहाँ तक पहुंचे और सिर्फ जगह ना मिल पाने के कारण इस एकलौती ट्रेन को छोड़ देते तो यह हमारे साथ सरासर ना इंसाफी थी। और फिर मैं यह मौका भी नहीं छोड़ना चाहता था । चल दिए हम ट्रेन की छत पर बैठकर कुन्नु की घाटियों की ओर ।

    जोरा से निकलने का बाद एक गाँव में इस ट्रेन का स्टेशन आया जिसका नाम था सिकरोदा। इसी नाम से एक स्टेशन सुबह भी मुझे आगरा से मुरेना आते समय रास्ते में मिला। अब रेलवे के हिसाब से एक ही नाम के दो स्टेशन अलग अलग नहीं हो सकते परन्तु यहाँ थे,  फर्क सिर्फ इतना था कि भारतीय रेलवे ने दोनों स्टेशनों के नाम तो एक ही लिख रखे हैं परन्तु रेलवे के रिकॉर्ड में आगरा से मुरेना के बीच पड़ने वाले सिकरोदा का नाम सिकरोदा क्वारी कर रखा है। और इस स्टेशन का नाम शुरू से ही सिकरोदा ही है ।

सिकरौदा से आगे चलने पर मुरेना - सबलगढ़ राजमार्ग भी हमारे साथ साथ ही चलने लगा, तभी ट्रेन में आगे से आवाज आई नीचे हो जाओ । मैंने आगे की तरफ देखा तो सोन नदी का पुल आ रहा था जो एक बड़े गार्डर का पुल था, हम नीचे की तरफ झुक गए और पुल आराम से गुजर गया । यहाँ ट्रेन और सड़क के लिए यह एक ही पुल था जिसमे सड़क के बीचों बीच रेल की पटरियां बनी हुई थीं और पुर के दोनों तरफ सड़क को रोकने के लिए फाटक । ऐसा पुल मैं पहले भी रूहेलखंड एक्सप्रेस के सफ़र के दौरान कछला ब्रिज पर देख चूका हूँ जो अब बंद हो चुका है।

    जोरा अलापुर स्टेशन के बाद इस रेल लाइन का अगला बड़ा स्टेशन कैलारस आया, यहाँ एक पहाड़ का ऊँचा सा टीला है जहाँ कैलारस क़स्बा बसा हुआ है, यहाँ दीपक  छत से उतर कर एक मक्के की भूटिया लेने चला गया तभी ट्रेन की सीटी बजी और ट्रेन रवाना हो चली, दीपक चलती ट्रेन में ही ट्रेन की छत पर चढ़ आया और मैंने राहत की सांस ली। ग्वालियर और श्योंपुर के बीच सबलगढ़ इस रेल लाइन का मुख्य स्टेशन है, यहाँ हमें श्योंपुर से ग्वालियर जाने वाली ट्रेन खड़ी हुई मिली। सबलगढ़ मुरेना जिले का मुख्य और अंतिम क़स्बा है इसके बाद श्योंपुर जिला शुरू हो जाता है और साथ कुन्नु के जंगल और घाटियाँ भी यहीं से शुरू हो जाती हैं ।



दीपक उपाध्याय , मेरा  छोटा भाई 
आगरा - झाँसी पैसेंजर 

चम्बल की घाटियाँ 

चम्बल के बीहड़ अथवा घाटियाँ 

चम्बल नदी 

झाँसी पैसेंजर , मुरेना स्टेशन पर 

मुरेना रेलवे स्टेशन  का एक दृश्य 

जोरा अलापुर स्टेशन की ओर 

जोरा अलापुर रेलवे स्टेशन 

जोरा  अलापुर 

एक अदभुत ट्रेन 



सोन नदी का पुल 

यही है भारतीय रेल यात्रा 

सिकरौदा रेलवे स्टेशन 

भटपुरा रेलवे स्टेशन 

यात्रा का एक दृश्य 

कैलारस रेलवे स्टेशन 

कैलारस रेलवे स्टेशन 

भुट्टा खाता दीपक 

भारतीय रेल यात्रा 

सोन के बाद दूसरा पुल 

सेमई रेलवे स्टेशन 

पीपल वाली चौकी  रेलवे स्टेशन , यहाँ कोई पीपल का पेड़ नहीं था , शायद अंग्रेजों के जमाने में हो 


अनोखे सफ़र पर पंडित जी 

सबलगढ़ में दीपक 

ग्वालियर जाने वाली ट्रेन का पहला क्रॉस सबलगढ़ पर 

ट्रेन का नाम 

सबलगढ़ रेलवे स्टेशन 

सबलगढ़ रेलवे स्टेशन 

अगले भाग में जारी