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Tuesday, February 19, 2013

रामेश्वरम यात्रा



रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग की ओर 


      शाम के पांच बज गए थे , ट्रेन अपने निर्धारित समय से चेन्नई से प्रस्थान कर चुकी थी, मैंने सोचा नहीं था कि ये सफ़र इतना रोमांचक हो सकता है , कैसे ?  बताता हूँ , शाम का वक़्त तो था ही, ट्रेन को डीजल इंजन बड़ी मस्त गति से दौड़ा रहा था , और साथ ही साथ हमारे साथ अभी चेन्नई भी चल रहा था, काफी देर बाद मुझे लगा कि  ट्रेन समुद्र के किनारे चल रही है परन्तु ये समुद्र नहीं था , ये थी चेन्नई की एक शानदार झील । ट्रेन झील के बिलकुल किनारे किनारे चल रही थी, ये मेरे सफ़र का एक वाकई सुखद अनुभव था ।

इसी झील के किनारे एक स्टेशन आया, चेंगलपट्टू जंक्शन । यहाँ से एक लाइन कांचीपुरम को चली जाती है जहाँ मैं जाना तो चाहता था पर आज नहीं , फिर कभी । किसी झील के किनारे मैंने पहली बार कोई स्टेशन देखा था। चेंगलपट्टू चेन्नई का आखिरी स्टेशन है इसके बाद रात हो गई , ट्रेन पता नहीं कहाँ कहाँ से होकर गुजरती रही और मैं चुपचाप सोता ही रहा ।

18 FEB 2013

    मेरी आँख खुली तो बड़ी तेज आवाजे आ रही थी , मैंने देखा कि ट्रेन बिलकुल खाली पड़ी है,  बस हम और कुछ चार पांच लोग ही शेष थे , नीचे देखा तो ट्रेन पामबन के ब्रिज से गुजर रही थी, इसी पुल को तो देखना था पर अँधेरे ने मेरे सपने पूरे नहीं होने दिए, कुछ ही देर में हम रामेश्वरम के स्टेशन पर थे, एक साफ़ सुथरा और शांत रेलवे स्टेशन ।

   स्टेशन पर ही एक कैंटीन बनी है वहां हमने चाय पी और मंदिर की ओर प्रस्थान किया, मुझे रामेश्वरम स्टेशन पर सामान जमा कराने के लिए क्लॉक रूम नहीं मिला इसलिए हमें यहाँ एक कमरा किराये पर लेना पड़ा, बड़ा ही महंगा था । होटल स्वामी ने हमें रामेश्वरम घूमने के सारा रास्ता बता दिया, उसका व्यवहार बिलकुल ऐसा था जिससे हमें लग ही नहीं रहा था कि हम एक होटल में हैं , बल्कि ऐसा लगा कि किसी रिश्तेदार के यहाँ हैं । उसने हमें समुद्र का रास्ता बताया स्नान करने के लिए ।

       सुबह छ बजे हम समुद्र के किनारे पर थे,  कहते हैं कि यहाँ भगवान राम ने सीता जी की अग्नि परीक्षा ली थी इसीलिए इस किनारे का नाम है अग्नि तीर्थ । हालाँकि गंगासागर में पहले भी मैंने समुद्र देखा रखा था पर ये एकदम शांत था , कारण था इसकी गोलाई का होना । नहा धोकर हम  मंदिर पहुंचे, बड़ी लम्बी लाइन लगी थी
     रामेश्वरम मंदिर का गलियारा भारत का सबसे बड़ा गलियारा है , यहाँ बाईस अलग अलग कुएँ हैं जिनमे अलग अलग तरह का पानी आता है, पता नहीं कहाँ से । मंदिर में जाने से पूर्व इन बाईस कुंडों के जल से स्नान करना भी जरुरी होता है जिसके लिए पच्चीस रुपये प्रति व्यक्ति टिकट लगती है । कहते हैं की इन कुंडों  का जल भारत के अन्य तीर्थो का जल है इसीलिए यहाँ हर कुंड का अपना एक अलग नाम है जैसे गंगा तीर्थ, यमुना तीर्थ ।

         मंदिर के अन्दर पहुंचे तो यहाँ तीन तरह की लाइन लगी थी , पहली वीआईपी जिसकी टिकट थी पांच सौ रूपये, शिव जी के शिवलिंग पर स्वयं जल चढ़ा सकते हो । दूसरी लाइन थी स्पेशल जिसकी टिकट थी सौ रुपये शिव जी के दरवाजे तक आ सकते हो । और तीसरी लाइन थी आम जनता की जो बिलकुल मुफ्त थी , दूर से ही दर्शन कर सकते हो , बस आपको एक ब्रिज पर चढ़ना है और ऊंचाई पर पहुँच कर आपको शिवलिंग दिखाई दे जाएगा और नहीं देख पाए तो तुम्हारा भाग्य । मैं तीसरी लाइन का ही आदमी था क्यों कि मेरा मानना है कि  भगवान कभी अपने भक्तों में भेदभाव नहीं रखते उनके लिए तो सब एक समान हैं, ये तो बस इंसान की कारीगरी है जो भगवान के घर पे भी कीमतें निर्धारित कर देती हैं ।

मंदिर के दर्शन तो कर लिए अब हमें वो सेतु देखना था जिस पर होकर राम जी अपनी सेना के साथ लंका पहुंचे थे। होटल वाले ने बताया कि वो धनुष्कोटी में है , मंदिर से धनुषकोटि की दूरी दस किमी थी , हमने दो ऑटो किराये पर लिए और चल दिए धनुष्कोटी की ओर। यहाँ तीनों तरफ अथाह सागर था पर एक दम शांत । ऑटो वाला हमें एक मंदिर पर लेकर गया और उसने बताया की ये विभीषण मंदिर है, यहाँ विभीषण राम की शरण में आये थे । और सामने हमने दूरबीन से देखा तो हमें कुछ लोग समुद्र में चलते हुए दिखाई दे रहे थे, दूरबीन वाले ने बताया की ये लोग उसी सेतु पर चल रहे हैं जो राम जी ने बनाया था ।

न चाहते हुए भी मुझे उसकी बात पर विश्वास करना पड़ा क्योंकि मैंने अपनी आँखों से उसी समुद्र में भयानक मगरमच्छ देखे थे, और उन लोगों को बीच समुन्द्र में अपने पैरो पर चलते देखा था नहीं तो डूबने में देर कैसी वो भी समुद्र में ।

यहाँ से आगे धनुषकोटि आठ किमी दूर थी जहाँ अंग्रेजों के जमाने का एक रेलवे स्टेशन भी था पर 1960 सन में आये चक्रवाती  तूफ़ान ने उसे अपने लपेटे में ले लिया और धनुषकोटि के साथ साथ स्टेशन भी समुन्द्र में समां गया , अब वहां उनके कुछ अवशेष ही मौजूद थे , समय के अभाव के कारण हम वहां तक नहीं जा पाए ।

कुछ समय बाद ऑटो वाला हमें एक टीले पर ले आया , इस टीले को गंधमादन पर्वत कहते हैं , कहा जाता है कि इसी टीले पर खड़े होकर भगवान राम ने अपनी वानर सेना को संबोधित किया था और हनुमान जी ने इसी टीले से लंका के लिए छलांग लगाई थी । पूरे रामेश्वरम की भूमि में सिर्फ यही एक टीला हमें देखने को मिला वर्ना चारोतरफ या तो समुन्द्र था या फिर रेत ।

इसके बाद ऑटो वाला हमें अब्दुल कलाम के घर लेकर आया , हाँ जी भारत के राष्ट्रपति और प्रसिद्ध वैज्ञानिक ए .पी .जे .अब्दुल कलाम । यहाँ उनके ही नाम से एक अति सुन्दर बाजार भी है । रामेश्वरम वाकई एक अच्छा तीर्थ स्थान होने के साथ साथ एक मनमोहक स्थल भी है जो हमें त्रेतायुग का अनुभव करा ही देता है । रामेश्वरम का चप्पा चप्पा राम का गुणगान करता है यह एक अटल सत्य है ।

शाम को हम स्टेशन पहुंचे , कैंटीन में खाना खाया और सो गए स्टेशन पर , अगली ट्रेन सुबह पांच बजे थी मदुरै के लिए ।

चेन्नई झील 

झील के किनारे से गुजरती ट्रेन 

ट्रेन में से झील के नज़ारे 


चेंगलपट्टू  स्टेशन पर कुमार 

रामेश्वरम स्थित अग्नि तीर्थ , जहाँ सीता जी ने अग्नि परीक्षा दी थी 

समुद्र में उपाध्याय जी 


रामेश्वरम मंदिर की ओर 


रामेश्वरम मंदिर 

मंदिर परिसर में खिलते राष्ट्रीय पुष्प , कमल 

कल्पना ,  मेरी पत्नी 

रामेश्वरम मंदिर का प्रवेश द्वार 

विभीषण मंदिर 

राम सेतु देखते लोग 

गंधमादन पर्वत पर स्थित राम चरण पादुका मंदिर , यही पर भगवान् राम ने खड़े
होकर वानर सेना को संबोधित किया था ।

मंदिर से नीचे जहाँ कभी वानर सेना बैठा करती थी 

गंधमादन पर्वत से दिखाई देता रामेश्वरम का टीवी टावर 

एक मंदिर 

मंदिर के सामने बना एक कुंड 

पानी में तैरते पत्थर 

मेरे सहयात्री , मेरे पिताजी और फूफाजी 


रामेश्वरम 

कालाराम मंदिर 

सर्प मंदिर 

मेरे सह यात्री 

पञ्चमुखी हनुमान मंदिर 


ठेले वाले बाबा प्रसन्न मुद्रा में 

रामेश्वरम स्टेशन 

रामेश्वरम रेलवे स्टेशन 


स्टेशन पर कुमार और बाबा 

रामेश्वरम स्टेशन रात के वक़्त

यात्रा का अगला भाग - मदुरै