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Sunday, July 30, 2017

BHANGARH




भानगढ़ - प्रसिद्ध हॉन्टेड पैलेस 

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     अजबगढ़ से निकलते ही शाम हो चली थी, घडी इसवक्त चार बजा रही थी और अभी भी हम भानगढ़ किले से काफी दूर थे।  सुना है इस किले में सूर्योदय से पहले और सूर्यास्त के पश्चात प्रवेश करना वर्जित है। अर्थात हमें यह किला दो घंटे के अंदर घूमकर वापस लौटना था। मैंने सोचा था कि भानगढ़ किला भी अजबगढ़ की तरह वीरान और डरावना सा प्रतीत होता होगा परन्तु जब यहाँ आकर देखा तो पता चला कि इस किले को देखने वाले हम ही अकेले नहीं थे, आज रविवार था और दूर दूर से लोग यहाँ इस किले को देखने आये हुए थे। किले तक पहुँचने वाले रास्ते पर इतना जाम था कि लग रहा था कि हम किसी किले की तरफ नहीं बल्कि किसी बिजी रास्ते पर हों।

AJABGARH FORT




अजबगढ़ की ओर 

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     नारायणी मंदिर से निकलते ही मौसम काफी सुहावना हो चला था। आसमान में बादलों की काली घटायें छाई हुईं थीं। बादल इसकदर पहाड़ों को थक लेते थे कि उन्हें देखने से ऐसा लगा रहा था जैसे हम अरावली की वादियों में नहीं बल्कि हिमालय की वादियों में आ गए हों। घुमावदार पहाड़ी रास्तों पर बाइक अपने पूरे वेग से दौड़ रही थी, यहाँ से आगे एक चौराहा मिला जहाँ से एक रास्ता भानगढ़ किले की तरफ जाता है और सामने की ओर सीधे अजबगढ़,  जो यहाँ से अभी आठ किमी दूर था। 

NARAYANI DHAM




नारायणी माता मंदिर - नारायणी धाम

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    टहला से अजबगढ़ जाते समय हम एक ऐसे स्थान पर आकर रुके जहाँ चारों और घने पीपल के वृक्ष थे, यह एक चौराहा था जहाँ से एक रास्ता नारायणी माता के मंदिर के लिए जाता है जो यहाँ से कुछ ही किमी दूर है। हमने सोचा जब ट्रिप पर निकले ही हैं तो क्यों ना माता के दर्शन कर लिए जाएँ और यही सोचकर हम नारायणी धाम की तरफ रवाना हो गए। यहाँ अधिकतर लोग लोकल राजस्थानी ही थे और इन लोगों में नारायणी माता की बड़ी मान्यता है। आज यहाँ मेला लगा हुआ था, काफी भीड़ भी थी और तरह तरह की दुकाने भी लगी हुईं थी।

TAHALA FORT



टहला किला का एक दृशय 

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     कुम्हेर का किला देखने के बाद हमने मोबाइल में आगे का रास्ता देखा, इस वक़्त हम भरतपुर से डीग स्टेट हाईवे पर खड़े थे, यहाँ से कुछ आगे एक रास्ता सिनसिनी, जनूथर होते हुए सीधे नगर को जाता है, जोकि शॉर्टकट है अन्यथा हाईवे द्वारा डीग होकर नगर जाना पड़ता, जो की लम्बा रास्ता है। हम सिनसिनी की तरफ रवाना हो लिए और जनूथर पहुंचे, जनूथर से नगर 22 किमी है। नगर पहुंचकर हम बस स्टैंड पर जाकर रुक गए। यहाँ हमने गर्मागरम जलेबा खाये।  

KUMHER FORT



कुबेर नगरी - कुम्हेर 


       अबकी बार मानसून इतनी जल्दी आ गया कि पता ही नहीं चला, पिछले मानसून में जब राजस्थान में बयाना और वैर की मानसून की यात्रा पर गया था, और उसके बाद मुंबई की यात्रा पर, ऐसा लगता है जैसे कल की ही बात हो। वक़्त का कुछ पता नहीं चलता, जब जिंदगी सुखमय हो तो जल्दी बीत जाता है और गर दिन दुखमय हों तो यही वक़्त कटे नहीं कटता है। खैर अब जो भी हो साल बीत चुका है और फिर मानसून आ गया है, और मानसून को देखकर मेरा मन राजस्थान जाने के लिए व्याकुल हो उठता है। इसलिए अबकी बार भानगढ़ किले की ओर अपना रुख है, उदय के साथ एक बार फिर बाइक यात्रा।

        आज रविवार था, मैं और उदय कंपनी से छुट्टी लेकर सुबह ही मथुरा से राजस्थान की तरफ निकल लिए और सौंख होते हुए सीधे राजस्थान में कुबेर नगरी कुम्हेर पहुंचे। यह मथुरा से 40 किमी दूर भरतपुर जिले में है। कहा जाता है कि यह नगरी देवताओं में धन के देवता कुबेर ने बसाई थी, वही कुबेर जो रावण के सौतेले भाई थे। यहाँ एक विशाल किला है जो नगर में घुसते ही दूर से दिखाई देता है। भानगढ़ की तरफ जाते हुए सबसे पहले हम इसी किले को देखने के लिए गए। किले के मुख्य रास्ते से न होकर हम इसके पीछे वाले रास्ते से किले तक पहुंचे जहाँ हमे एक जल महल भी देखने को मिला।

Wednesday, April 12, 2017

DWARIKA EXPRESS

द्धारिका यात्रा 

पहला पड़ाव - जयपुर 

     चार धामों में से एक और सप्तपुरियों में से भी एक भगवान श्री कृष्ण की पावन नगरी द्धारिका की यह मेरी पहली यात्रा थी जिसमे मेरे साथ मेरी माँ, मेरी छोटी बहिन निधि, मेरी बुआजी बीना और मेरे पड़ोस में रहने वाले भाईसाहब और उनकी फेमिली थी।  मैंने जयपुर - ओखा साप्ताहिक एक्सप्रेस में रिजर्वेशन करवाया था इसलिए हमें यह यात्रा जयपुर से शुरू करनी थी और उसके लिए जरूरी था जयपुर तक पहुँचना।

     हमारे पड़ोस में रहने वाले एक भाईसाहब अपनी जायलो से हमें मुड़ेसी रामपुर स्टेशन तक छोड़ गए यहाँ से हमें मथुरा - बयाना पैसेंजर मिली जिससे हम भरतपुर उतर गए। भरतपुर से जयपुर तक हमारा रिजर्वेशन मरुधर एक्सप्रेस में था जो आज 2 घंटे की देरी से चल रही थी ,चूँकि पिछली पोस्ट में भी मैंने बताया था कि भरतपुर एक साफ़ सुथरा और प्राकृतिक वातावरण से भरपूर स्टेशन है।  यहाँ का केवलादेव पक्षी विहार पर्यटन क्षेत्र में अपना महत्वपूर्ण स्थान रखता है जहाँ आपको दूर देशों के पक्षी भी विचरण करते हुए देखने को मिलते हैं,|इसी की एक झलक भरतपुर स्टेशन की दीवारों पर चित्रकारी के माध्यम से हमें देखने को मिलती है।

Sunday, March 26, 2017

JODHPUR


मेहरान गढ़ की ओर

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       शाम को पांच बजे तक सिंधी कैंप बस स्टैंड आ गया यहाँ से गोपाल ने एक डीलक्स बस में मेरी टिकट ऑनलाइन करवा दी थी जिसके चलने का समय शाम सात बजे का था, काफी पैदल चलने की वजह से मैं काफी थक चुका था इसलिए बस में जाकर अपनी सीट देखी, यह स्लीपर कोच बस थी मेरी ऊपर वाली सीट थी उसी पर जाकर लेट गया। ट्रेन की अपेक्षा बस मे ऊपर वाली सीट मुझे ज्यादा पसंद है क्यूंकि बस की ऊपर वाली सीट में खिड़की होती है। 
         मैंने गोपाल को फोनकर बस के जोधपुर पहुंचने का टाइम पुछा उसने बताया रात को 2 बजे।  उसी हिसाब से अलार्म लगाकर मैं सो गया और फिर ऐसी नींद आयी की सीधे बाड़मेर से सत्तर किमी आगे डोरीमन्ना में जाकर खुली, जोधपुर और बाड़मेर कबके निकल चुके थे मैंने बस वाले से पुछा भाई हम कहाँ हैं मुझे तो जोधपुर उतरना था तुमने जगाया क्यों नहीं। वह मेरी तरफ ऐसा देख रहा था जैसे मैंने को महान काम कर दिया हो, उसने मुझसे कहा की आधा घंटा और सोते रहते तो पाकिस्तान पहुँच जाते। 

JAIPUR

आमेर किले की ओर 

     मुंबई से लौटे हुए अब काफी समय हो चुका था इसलिए अब मन नई यात्राओं की तैयारी कर रहा था बस जगह नहीं मिल रही थी, यूँ तो कुछ दिन बाद द्धारका यात्रा का प्लान तैयार था परन्तु उसमे अभी काफी समय था, मन बस अभी जाना चाहता था और ऐसी जगह जहाँ कुछ देखा न हो | काफी सोचने के बाद मुझे मेरे भाई गोपाल की याद आई जो इन दिनों जोधपुर में था, गर्मी के इस मौसम में रेगिस्तान की यात्रा ......... मजबूरी है।

शाम को घर जाकर जोधपुर हावड़ा एक्सप्रेस में रिजर्वेशन करवाया और यात्रा शुरू। शाम को मेवाड़ एक्सप्रेस पकड़कर भरतपुर पहुँच गया और ट्रैन का इंतज़ार करने लगा। 

Saturday, July 16, 2016

WAIR FORT


 DATE :- 16 JULY 2016

ऊषा मंदिर और वैर फोर्ट 

       यात्रा एक साल पुरानी है परन्तु पब्लिश होने में एक साल लग गई, इसका एक अहम् कारण था इस यात्रा के फोटोग्राफ का गुम हो जाना परन्तु भला हो फेसबुक वालों का जिन्होंने मूमेंट एप्प बनाया और उसी से मुझे मेरी एक साल पुरानी राजस्थान की मानसूनी यात्रा के फोटो प्राप्त हो सके। यह यात्रा मैंने अपनी बाइक से बरसात में अकेले ही की थी। मैं मथुरा से भरतपुर पहुंचा जहाँ पहली बार मैंने केवलादेव घाना पक्षी विहार देखा परन्तु केवल बाहर से ही क्योंकि इसबार मेरा लक्ष्य कुछ और ही था और मुझे हर हाल में अपनी मंजिल तक पहुंचना ही था, मेरे पास केवल आज का ही समय था शाम तक मुझे मथुरा वापस भी लौटना था।

Sunday, September 8, 2013

MUNABAO



बाड़मेर की तरफ़ 

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    आज मैंने पहली बार सूर्य नगरी में कदम रखा था। मैं जोधपुर स्टेशन पर आज पहली बार आया था, यहाँ अत्यधिक भीड़ थी। कारण था बाबा रामदेव का मेला, जो जोधपुर - जैसलमेर रेलमार्ग के रामदेवरा नामक स्टेशन के पास चल रहा था। मैंने इंटरनेट के जरिये यहाँ से जैसलमेर के लिए रिज़र्वेशन करवा लिया था किन्तु वेटिंग में, अब पता करना था कि टिकट कन्फर्म हुई या नहीं। मैंने पूछताछ केंद्र पर जाकर पुछा तो पता चला कि टिकिट रद्द हो गई थी, मेरा चार्ट में नाम नहीं था।

     मैं स्टेशन के बाहर आया और यहाँ के एक ढाबे पर खाना खाया। यहाँ मैंने देखा कि सड़क पर दोनों तरफ चारपाइयाँ ही चारपाइयाँ बिछी हुई हैं बाकायदा बिस्तर लगी हुई। किराया था एक रात का मात्र 40 रुपये। परन्तु इसबार मेरा सोने का कोई इरादा न था मुझे बाड़मेर पैसेंजर पकड़नी थी जो रात 11 बजे चलकर सुबह 5 बजे बाड़मेर पहुंचा देती है। इसप्रकार मैं बाड़मेर भी पहुँच जाऊँगा और रात भी कट जाएगी। मैंने ऐसा ही किया।

    बाड़मेर पैसेंजर से मैं सुबह पांच बजे ही बाड़मेर पहुँच गया, स्टेशन पर बने वेटिंग रूम में नित्यक्रिया से फुर्सत होकर बाहर गया और एक राजस्थानी बाबा की दुकान पर दस रुपये वाली बाड़मेरी चाय पीकर आया। सुबह साढ़े सात बजे मुनाबाब लिए यहाँ से पैसेंजर जाती है, मुनाबाब जाने के लिए ट्रेन  स्टेशन पर तैयार खड़ी थी, तभी मैंने देखा कि मुनाबाब की ओर जाने वाली दूसरी लाइन के सिग्नल हरे हो रहे हैं, मतलब पैसेंजर से पहले कोई और ट्रेन  मुनाबाब की और जाने वाली थी जिसका स्टॉप बाड़मेर स्टेशन पर नहीं था, और जब ट्रेन हमारे सामने से गुजरी तो पता चला कि यह थार एक्सप्रेस थी जो कि पाकिस्तान वाले यात्रियों को लेकर मुनाबाब जा रही है ।

   थार एक्सप्रेस जोधपुर के भगत की कोठी स्टेशन से चलकर भारत देश के आखिरी स्टेशन मुनाबाब तक जाती है और मुनाबाब पर पाकिस्तान की दूसरी थार एक्सप्रेस आती है जो भारतीय थार एक्सप्रेस के यात्रियों को कराची लेकर जाती है। यह ट्रेन पूरी तरह से कवर्ड रहती है ।

     मैं अपनी पैसेंजर ट्रेन से मुनाबाब तक घूम आया, यह भारत का आखिरी रेलवे स्टेशन है इसके बाद रेलवे लाइन एल ओ सी पार करके पाकिस्तान में चली जाती है जहाँ हम नहीं जा सकते थे। यहाँ न कोई शहर था न कोई गांव, सिर्फ था तो केवल रेगिस्तान और भारतीय फ़ौज़ की चौकियां, यहाँ से पाकिस्तान महज एक किलोमीटर दूर था। मैं मुनाबाब देखकर वापस बाड़मेर आ गया और वहां से फिर जोधपुर। जोधपुर से शाम को मेरा हावड़ा एक्सप्रेस में रिजर्वेशन था दुसरे दिन मैं आगरा पहुँच गया।

जोधपुर  स्टेशन 

JODHPUR RAILWAY STATION

BADMER RAILWAY STATION

BADMER RAILWAY STATION

BADMER

BADMER

BHACHBHAR RAILWAY STATION

RAMSAR RLY. STATION

GAGRIYA RAILWAY STATION

GAGRIYA RAILWAY STATION

BADMER

BADMER

BADMER

BADMER

BADMER TO MUNAWAO

BADMER

BADMER

LEELMA RAILWAY STATION

BADMER

BADMER


MUNABAO RAILWAY STATION IND.

MUNABAO RAILWAY TIME TABLE

MUNABAO

MUNABAO

MUNABAO

MUNABAO RAILWAY STATION

MUNABAO

MUNABAO RLY STATION PAK

MUNABAO

MUNABAO RAILWAY STATION PAKISTAN

JAISINDER RAILWAY STATION

गडरा गांव विभाजन से पहले हिंदुस्तान की जमीन पर था, पर आज यह गांव पाकिस्तान में है और इस गांव का रेलवे स्टेशन आज भी भारत में ही है, रास्ता तो खो गया पर स्टेशन आज भी मौजूद है । और यही वो रेलवे स्टेशन जहाँ दुश्मनों ने रेलवे कर्मचारियों को मौत के  कर इस स्टेशन को आग लगा दी थी ।   

एक राजस्थानी महिला 

राजस्थान 

मुनाबाव - बाड़मेर पैसेंजर 

बाड़मेर  स्टेशन  

          

Saturday, September 7, 2013

AII - JU PASSENGER



अजमेर - जोधपुर  पैसेंजर यात्रा

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    अजमेर से दोपहर दो बजे जोधपुर के लिए एक पैसेंजर चलती है जो मारवाड़ होते हुए शाम को जोधपुर पहुँच जाती है। इस पैसेंजर ट्रेन में रिजर्वेशन की सुविधा भी उपलब्ध है। मैंने आगरा में ही इस ट्रेन में अपना रिजर्वेशन करवा लिया था। दोपहर दो बजे तक मैं अजमेर स्टेशन पर था और ट्रेन भी अपने सही समय पर स्टेशन से चलने की तैयार खड़ी हुई थी। इसी बीच रानीखेत एक्सप्रेस भी आ चुकी थी। गर मेरा इस पैसेंजर में रिजर्वेशन न होता तो शायद मैं इसी ट्रेन से जोधपुर जाता।

Friday, September 6, 2013

AJMER - 2013


अजमेर दर्शन और तारागढ़ किला 


      एक अरसा बीत चुका था बाबा से मिले, तो सोचा क्यों न उनके दर पर इस बार हाजिरी लगा दी जाय। बस फिर क्या था, खजुराहो एक्सप्रेस में आरक्षण करवाया और निकल लिए अजमेर की ओर। मैं रात में ही अजमेर पहुँच गया, और वहां से फिर दरगाह। अभी बाबा के दरबाजे खुले नहीं थे, मेरी तरह बाबा के और भी बच्चे उनसे मिलने आये हुए थे जो उनके दरबाजे खुलने का इंतज़ार कर रहे थे, इत्तफाक से आज ईद भी थी। दरगाह का नज़ारा आज देखने लायक था ।

Friday, June 7, 2013

ROOPVAS


एक सफ़र रूपवास की ओर

      आगरा से एक रास्ता जगनेर और तांतपुर की तरफ जाता है, रास्ते में रघुकुल कॉलेज भी पड़ता है जहाँ आज निधि का इतिहास का पेपर था, मैंने निधि को कॉलेज तक छोड़ दिया और इससे आगे चल दिया जगनेर की ओर। आगरा से जगनेर करीब पचास किमी दूर है, और उत्तर प्रदेश का आखिरी हिस्सा भी है जगनेर के तीनों ओर रूपवास की सीमा है, जगनेर से कुछ किमी पहले सरेंधी नामक एक चौराहा भी है जहाँ राजस्थान के भरतपुर से एक सड़क धोलपुर की ओर जाती है और उत्तरप्रदेश की एक सड़क तांतपुर से आगरा की ओर आती है अतः दोनों राज्यों की सडकों का मेल सरेंधी पर ही होता है मैं सरेंधी पहुंचा, यहाँ नाश्ते की कुछ दुकाने खुली हुई थी , मैंने दो कचोड़ी खाई और रूपवास की ओर चल दिया

Sunday, January 27, 2013

MAVLI TO MARWAR



कांकरोली से मारवाड़ मीटर गेज पैसेंजर ट्रेन यात्रा

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     मैं राजनगर से कांकरोली स्टेशन पहुंचा, अपने निर्धारित समय पर ट्रेन भी आ पहुंची, सर्दियों के दिन थे इसलिए मुझे धुप बहुत अच्छी लग रही थी। कांकरोली से आगे यह मेरा पहला सफ़र था, मुझे इस लाइन को देखना था, मेवाड़ से ट्रेन मारवाड़ की ओर जा रही थी, मेरे चारों तरफ सिर्फ राजस्थानी संस्कृति ही थी। ट्रेन लावा सरदारगढ़ नामक एक स्टेशन पर पहुंची, यहाँ भी मार्बल की माइंस थीं, और एक किला भी बना हुआ था, शायद उसी का नाम था सरदारगढ़। ट्रेन इससे आगे आमेट पहुंची, आमेट के स्टेशन का नाम चार भुजा रोड है, यहाँ से एक रास्ता चारभुजा जी के लिए जाता है, इससे आगे एक स्टेशन आया नाम था दौला जी का खेडा।

Friday, January 18, 2013

RAJSAMAND - 2013


राजसमन्द में एक बार फिर

     इस बार आगरा में सर्दी काफी तेज थी और इन सर्दियों में, मैं फ़ालतू घर पर बैठा था। कल्पना भी अपने मायके गई हुई थी इसलिए अपने आपको फ़ालतू और अकेला महसूस कर रहा था। कंप्यूटर भी इन दिनों खराब पड़ा था, सिवाय टीवी देखने के मेरे पास कोई काम नहीं था, लेकिन टीवी भी बेचारी कब तक मेरा मन लगाती।तभी जीतू का फोन आया तो उसे मैंने अपनी परेशानी बताई, उसने मुझे अपने पास आने की कहकर मेरी परेशानी मिनटों में हल कर दी ।मे 

     माँ की आज्ञा लेकर मैं सीधे स्टेशन गया और अनन्या एक्सप्रेस में रिजर्वेशन करवा लिया । दुसरे दिन मैं राजसमन्द के लिए गया। ट्रेन सही समय पर आगरा फोर्ट पर आ गई और मैंने अपनी सीट ढूँढी, देखा तो ऊपर की थी।कमबख्त से मांगी तो साइड लोअर थी पर नसीब में ऊपर वाली ही लिखी थी। ट्रेन सवाई माधोपुर होते हुए जयपुर पहुंची । यहाँ मेट्रो का काम तेजी पर चल रहा था, ट्रेन दुर्गापुरा स्टेशन पर काफी देर खड़ी रही उसके बाद जयपुर स्टेशन पर पहुंची। यहाँ मुझे चाय पीने का मौका मिल गया, ट्रेन की चाय से यह चाय कई गुना बेहतर थी।

     जयपुर से ट्रेन अजमेर पहुंची, पिछली बार अजमेर से इसी ट्रेन में, मैं कल्पना और दिलीप के साथ उदयपुर गया था और आज मैं अकेला जा रहा था। मुझे यहाँ कल्पना की काफी तेज याद आ रही थी, पर ज्यादा नहीं क्योंकि आज भी मैं अकेला बेशक था पर गुमशुम नहीं। मुझे एक सज्जन मिल गए थे चित्तौड़गढ़ जा रहे थे, काफी दूर तक मेरी और उनकी बातें होती रहीं और बाद में मोबाइल में अलार्म लगाकर मैं सो गया ।

     कुछ देर बाद मोबाइल का अलार्म बज गया, देखा ट्रेन अपनी गति से दौड़ रही थी और मोबाइल में रात का एक बजा था। मतलब ट्रेन मावली के आसपास ही थी, तभी एक स्टेशन आया  'कपासन', ट्रेन सही बीस सेकंड में स्टेशन को पार गई। ट्रेन ने मुझे रात के डेढ़ बजे मावली जंक्शन पर उतार दिया। साथ मैं एक दो मुसाफिर और उतरे । कड़ाके की सर्दी पड़ रही थी, मैं ठण्ड से कंपा जा रहा था, एक तो आँखों में नींद और फिर यह जनवरी की कड़ाके की ठण्ड भरी रात। मैं काँपता हुआ ही टिकट घर पहुंचा, सोचा कोई चाय की दूकान होगी मगर यहाँ भी कोई दूकान नहीं थी, कुछ मारवाड़ी लोग लकड़ियाँ जलाकर ताप रहे थे, मैं भी अपने आपको सेकने लगा । सर्दियों में आग सबसे प्यारी चीज होती है और इसी प्यारी चीज़ के सहारे मैंने दो घंटे स्टेशन पर बिताये।

     मावली से कांकरोली के लिए पैसेंजर सुबह 6 बजे थी, मैं ट्रेन में जाकर सो गया यहाँ मेरे साथ एक मार्केटिंग एग्जीक्यूटिव भी था जो पाली जा रहा था, वह बनारस का रहने वाला था। उसके पास ओढ़ने के लिए एक स्वाफी के अलावा कुछ भी न था, मेरे पास दो चादर थीं एक ओढ़ने की और एक बिछाने की। मैंने एक चादर उसे दे दी और वह सर्दी से कुछ हद तक स्वयं को बचा सका ।

      सर्दी अधिक थी और एक मीटर गेज की ट्रेन में लकड़ी की सीट पर मुझे कहाँ नींद आने वाली थी। बस सर्दी से मुंह छिपाए चादर ओढ़ कर चुपचाप लेटा ही रहा। पाली जाने वाला मुसाफिर कबका सो गया था, मुझे पता ही नहीं चला। सुबह ट्रेन अपने निर्धारित समय से कांकरोली की ओर रवाना हो चली। एक मुसाफिर और आ गया, यह राजस्थानी था और मावली के पास किसी गाँव का रहने वाला था। जेके टायर में नौकरी करता था सो कांकरोली जा रहा था। नाथद्वारा स्टेशन तक बड़ी लाइन बिछ चुकी थी आगे काम जारी था वैसे नाथद्वारा से अगला स्टेशन कांकरोली ही था, इस स्टेशन के प्लेटफ़ॉर्म की रेलवे लाइन उखाड़ दी गई है मतलब अब मीटर गेज के कुछ ही दिन और शेष हैं।          

      स्टेशन से ऑटो पकड़कर मैं राज नगर पहुंचा, भाई खिड़की से मुझे देख रहे थे। मैं भैया के पास गया वह मुझे देखकर काफी खुश हुए और मैं भी। उनकी ड्यूटी का टाइम भी हो चला था इसलिए मैं जीतू के पास गया जीतू भी माइंस पर जाने के लिए निकल ही रहा था सो मैं भी चल दिया जीतू के साथ उसकी माइंस की ओर। पूरा दिन हमें माइंस में हो गया और शाम को हम घर पहुंचे। बड़े भाई ने मुझे और जीतू को फोन करके अपने घर बुलाया और एक साथ बैठकर खाना खाया। उनका यह प्यार मेरे लिए काबिले तारीफ था ।

      दुसरे दिन भी मैं जीतू के साथ उसकी दूसरी माइंस पर गया, इस माइंस का नाम निर्मल था यह जीतू की पसंदीदा माइंस थी, क्योंकि वह यहाँ अकेला मशीन ऑपरेटर था। दोपहर का लंच जीतू अपने स्टाफ के साथ ही करता है यह उसकी एक अच्छी आदत थी जो मुझे इसवक्त नजर आई। जीतू वाकई एक अच्छा इंसान है यह तो मुझे हमेशा से ही पता था ।

      परन्तु बड़े भाई की अच्छाई का तो कोई मोल ही नहीं है, कुछ दिन मैं बड़े भाई के साथ भी रहा, उन्होंने प्रतिदिन मेरी जरूरतों का ध्यान रखा। एकबार मैं उनके साथ माइंस पर भी गया, सर्दी भरी रात में बड़े भाई की माइंस पर जाकर पहले मैंने खाना खाया और बड़े भाई के साथ एक कंबल के नीचे मार्बल की एक बड़ी सी शिला पर मैं सो गया, हमारे ऊपर एक बहुत बड़ा पहाड़ था जिसे बीच में से काट दिया गया था तभी भाई को किसी ने आवाज दी और भाई चल गए मशीन को चलाने के लिए ।

     बड़े भाई की माइंस का नाम केलवा था, इस माइंस में एक पहाड़ पर केल्वा के नाम से किला भी था, रात्रि होने की वजह से मैं इसे देख नहीं सका, पर भाई ने अपनी माइंस को मुझे दिखाया। यहाँ काफी बड़े बड़े घोड़े बंधे थे, जो रेश में दौड़ा करते थे और इसी माइंस में शूटिंग रेंज भी थी जहाँ माइंस के मालिक और उनके यार दोस्त बंदूकों से निशाना लगाना सीखते हैं । इसी माइंस के अन्दर कृषि कार्य भी आवश्कता के अनुसार किया जाता है, गाय , भैंस और उनके खाने के लिए यहाँ खेत में उपजी फसल वाकई देखने लायक थी। ऐसी माइंस मैंने पहली बार देखी थी ।

     सुबह मैं भाई के साथ राजनगर आ गया, रात भर ड्यूटी करने के बाद भी बड़े भाई की आँखों में नींद नहीं थी । माइंस में नौकरी करने के अलावा बड़े भाई आदर्श कोपरेटिव सोसाइटी लिमिटेड के भी सदस्य हैं और इसके अलावा भारतीय जीवन बीमा निगम में भी एजेंट के रूप में कार्यरत हैं। किसी इंसान को दिनरात काम करते मैंने आज ही देखा था। कितना अंतर था जीतू और बड़े भाई में, जीतू वो इंसान था जो सुबह घर से ड्यूटी के लिए निकलता है और शाम को वापस आ जाता है और बड़े भाई रात भर माइंस में ड्यूटी करते हैं और सुबह आदर्श में बाद एलआइसी जाते हैं।

      मैं करीब दस दिन राजसमन्द में रहा, इनदिनों मैं कहीं भी घूमने नहीं जा पाया। बस एक दिन सनी के साथ नौचौकी चला गया और एक दिन बड़े भाई के साथ कांकरोली में द्वारिकाधीश जी के दर्शन करने भी गया।  इस बार केलवा रेस्टोरेंट में मैंने जीतू और उसके साले वीकेश के साथ खाना खाया। एक दिन बड़े भाई की बाइक से कांकरोली और राजसमंद किला भी देख आया यहीं मुझे पता चला कि पच्चीस जनवरी को एक नई मूवीज रिलीज हो रही है नाम था रेस -2 । मैंने बड़े भाई को मूवीज देखने के लिए मनाया और राजसमन्द के सिनेमा घर में हमने पहले दिन ही यह मूवीज देखी।

      अगले दिन गणतंत्र दिवस है, अब मेरा मन राजसमन्द में नहीं लग रहा था, मुझे अपने घर और शहर की याद आने लगी थी, इसलिए बड़े भाई से आज्ञा ली और कांकरोली स्टेशन आया। भैया और जीतू दोनों ही अपनी माइंस पर गए हुए थे इसलिए भाभी से विदा लेकर अकेला ही कांकरोली आया और यहाँ से मारवाड़ की पैसेंजर ट्रेन पकड़ के मारवाड़ की ओर रवाना हो लिया ।


जीतू , अपनी मशीन पर 

मशीन चलाता जीतू 

मार्बल माइंस का एक उपकरण 


मार्बल माइंस में खड़ी जीतू की बाइक 

मार्बल की शिलाएं 

मार्बल निकालती मशीन 



मार्बल माइंस 

माइंस में जेसीबी भी अपनी अहम भूमिका निभाती है 

माइंस के रास्ते में एक गाँव , निझरणा 

निझरणा गाँव का एक दृश्य 

भैया के घर की छत का एक दृश्य 

यहीं से नजर आता है राजनगर किला, काफी दूर है कैमरा से  

बड़े भाई का पुत्र , सनी भरद्वाज 

सनी और नंदिनी 


यह शरारत भी करती है 

 भाई बहिन राजसमन्द झील के किनारे  

जीतेन्द्र का पुत्र , तुषार 

बड़े भाई की एक ऑफिस 

बड़े भाई की बाइक , जिससे मैंने कांकरोली और राजनगर घूमे 

अपनी छत पर पतंग उड़ाते धर्मेन्द्र भाई 

धर्मेन्द्र भारद्वाज 

द्वारिकाधीश जी के मदिर में 

राजसमन्द झील के किनारे 


द्वारिकाधीश जी का मंदिर भी इसी झील के किनारे है , जहाँ अभी हम खड़े हैं 


यात्रा अभी जारी है, अगला भाग - कांकरोली से मारवाड़ पैसेंजर यात्रा