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Tuesday, June 18, 2013

पठानकोट की तरफ




   पठानकोट की तरफ 

        समता एक्सप्रेस के आने से पांच मिनट पहले ही हम स्टेशन पहुँच गए थे, आज  ट्रेन अपने निर्धारित समय से पहले ही आ गयी थी, हमने अपनी सीट पर अपना स्थान ग्रहण किया और चल दिए निजामुद्दीन की ओर। मुझे इस यात्रा मैं कल्पना को अपने साथ ना लाने का बड़ा ही दुःख रहा, हम निजामुद्दीन पहुंचे, समता एक्सप्रेस की सेवा यहाँ समाप्त हो गयी । यहाँ से हमें एक लोकल मिली जो शकूरबस्ती जा रही थी , हम इसी लोकल में चढ़ लिए,यह प्रगति मैदान पर आकर खड़ी हो गयी, वैसे यहाँ बहुत ही कम ट्रेनों का स्टॉप है और ये सभी ट्रेन लोकल ही कहलाती हैं।

      तभी बीच लाइन में एक पैसेंजर आकर रुकी, मुझे लगा बुलंदशहर जा रही है। हम लोकल शटल को छोड़कर इस पैसेंजर में सवार हो गए, यह नई दिल्ली के प्लेटफोर्म 1 पर आकर खड़ी हो गई। यहाँ मुझे पता चला कि यह रेवाड़ी जाने वाली पैसेंजर है, बुलंदशहर वाली प्लेटफोर्म नंबर दस पर आ रही है। हमने ये पैसेंजर भी छोड़ दी और प्लेटफोर्म दस पर उक्त ट्रेन की प्रतीक्षा करने लगे। कुछ समय में ट्रेन भी आ गई और हम दिल्ली जंक्शन पहुँच गये, यहीं से रात को दस बजे थी हमारी ट्रेन धौलाधार एक्सप्रेस । 

       अभी दस बजने में काफी समय था , मैं और कुमार चल दिए चाँदनीचौक के नज़ारे देखने। शाम के समय चाँदनी चौक का बाजार और भी रंगीन हो जाता है , दिल्ली की इसी रौनक को देखकर मेरा मन हमेशा से दिल्ली में बसने के लिए करता था। पर ईश्वर  ने धरती पर मुझे जो स्थान दिया है मुझे वही प्रिय था। काफी देर घूमघाम कर हम वापस स्टेशन पहुंचे , यह पुरानी दिल्ली भी कहलाता है। कभी इस स्टेशन के स्टेशन प्रबंधक मेरे पिताजी के ताऊजी थे, जिन्होंने अपने जीवन में अनेक भारतीय यात्रायें की थी, आज उनकी पदवी पर मैं चल रहा हूँ, फर्क है तो सिर्फ इतना कि वो एक सरकारी आदमी थे और मैं एक प्राइवेट आदमी । 

       ट्रेन प्लेटफोर्म  पर लग चुकी थी , मुझे बड़ी जोर से नींद आ रही थी सो मैं तो सो गया अपनी सीट पर और जब आँख खुली तो ट्रेन पंजाब के एक छोटे से स्टेशन पर खड़ी हुई थी। मैं ट्रेन से नीचे उतरा और पानी पीकर आया और फिर सो गया । दुबारा जब आँख खुली तो ट्रेन लुधियाना पहुँच चुकी थी , यहाँ मैंने एक चाय पी, सात रुपये की हो गयी है चाय अब प्रत्येक जगह पर । दाम तो बढे पर क्वालिटी ऐसे की ऐसी है वही घटिया एकदम । ट्रेन का स्टॉप फगवाडा में नहीं है फिर भी दस मिनट के लिए इसे यहाँ खड़ा कर दिया गया , और कुछ ही देर में ट्रेन चक्की बैंक पहुँच गयी , यहाँ भी इस ट्रेन का स्टॉप नहीं है फिर भी इसे यहाँ रोक दिया गया और जम्मू जाने वाले यात्रियों को मौका मिल गया यही उतरने का वर्ना पठानकोट से ऑटो से लौटकर आना पड़ता । 

      हम पठानकोट स्टेशन पहुंचे , सामने नेरो गेज की पैसेंजर तैयार खड़ी  हुई थी , अभी इसे चलने में एक घंटा शेष था और ट्रेन में पैर रखने की भी जगह शेष नहीं बची थी, पिछली बार तो हमने इसकी कई सीटों पर धावा बोल दिया था , इसबार हमारा भाग्य खराब था । मैं और कुमार आखिरी डिब्बे में सवार हो गए, यह लेड़ीजों के लिए आरक्षित था फिर भी हमारी मजबूरी थी, इसी में सफ़र करना था । 

प्रगति मैदान स्टेशन पर बाबा 

सुभाष चंद गर्ग   " ठेले वाले बाबा "

नई दिल्ली  रेलवे स्टेशन 

नई दिल्ली पर हम भी 
फगवाड़ा स्टेशन का एक दृश्य
फगवाडा रेलवे स्टेशन 

पठानकोट स्टेशन पर तीर्थ यात्री 

तीर्थ यात्री 

हिमाचल प्रदेश के दर्शनीय स्थल उत्तर रेलवे की तरफ से 

काँगड़ा वैली टॉय ट्रेन 

महिलाओं के डिब्बे में कुमार 

यही इंजन लेकर जाएगा इस ट्रेन को 

पठानकोट स्टेशन पर सुधीर उपाध्याय 


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