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Friday, July 5, 2013

रूहेलखंड एक्सप्रेस से एक सफ़र




कासगंज स्टेशन पर एक रात 


    आज मेरा मन मीटर गेज की ट्रेन से यात्रा करने का था सो प्लान बना लिया कि कासगंज से गोंडा के रूट पर 
यात्रा की जाए । दिन गुरूवार था, आगरा कैंट से कोलकाता के लिए सुपरफास्ट जाती है कासगंज होकर जो रात ८ बजे कासगंज पहुँच जाती है। और कासगंज से 9:15 pm पर बरेली तक जाती है और वहां से सुबह 4 बजे गोंडा के लिए पैसेंजर जाती है । प्लान तो अच्छा था लेकिन शायद किस्मत को कुछ और ही मंजूर था , कोलकाता  एक्सप्रेस आज चार घंटे लेट हो गई और गोंडा जाने का प्लान ठप्प हो गया । 

     रात बारह बजे कासगंज पहुंचा, सन्नाटा था , प्लेटफोर्म पर यात्री सोये पड़े थे शायद टनकपुर जा रहे थे । या फिर कानपुर की ओर। खैर अपनी मंजिल कुछ और ही थी । गोंडा की तो कोई ट्रेन नहीं थी लेकिन लखनऊ की थी रूहेलखंड एक्सप्रेस जो सुबह पांच बजे चलकर शाम को पांच बजे लखनऊ पहुँच जाती है, यानी बारह घंटे का सफ़र पर बहुत ही मजेदार । कैसे ? आगे जानिये । 

      मुझे कासगंज पर पांच घंटे बिताने ही थे लेकिन अकेले नहीं, इधर हमारी श्रीमती जी को भी नींद नहीं आ रही थी सो लगे एक दुसरे से बात करने एयरटेल की कृपा से, आज समझ आया कि मोबाइल कम्पनियाँ रात को कॉल रेट इतने सस्ते क्यों कर देती हैं ताकि लोग रात को गर सोना न चाहे तो कम से कम स्वयं को अकेला महसूस भी न करे। एयरटेल का ही कहना है कि बातें गिरा देती हैं फासलों की दीवार । सो बेशक मेरी पत्नी मुझसे कोसों दूर थी लेकिन एयरटेल की वजह से ऐसा लगा जैसे की मेरे नजदीक ही थी , वैसे इसका श्रेय सिर्फ एयरटेल को दे तो गलत होगा, मुख्य भूमिका नोकिया की भी थी जो ऐसी पावरफुल बैटरी देता है कि खत्म ही नहीं होती, सो नोकिया और एयरटेल का धन्यवाद । 

      बातें करते करते तीन बज गए अब उसे नींद भी आने लगी, सो मैंने कॉल डिसकनेक्ट किया और स्टेशन से बाहर आकर चाय पीने चला आया, स्टेशन के बाहर कुछ रिक्शे वाले भी अपने रिक्शे पर सोये पड़े थे तभी एक दबंग सा आदमी आया और उनके आगे के पहिये की हवा निकालकर उन्हें जगाने लगा, बेचारे रिक्शे वाले  क्या कर सकते थे, चल दिए रात को तीन बजे किसी हवा वाले की दुकान को ढूँढने ।

     मुझे यह देखकर बड़ा दुःख हुआ कि एक तो गरीबी की मार फिर ऊपर से समाज के इन ठेकेदारों की मार, असली मरना तो गरीब का ही है, एक गरीब की रोजी रोटी ही उसकी सबसे बड़ी इज्ज़त होती है और गर उस पर ही कोई हमला करे तो उस गरीब के दिल से वो हाय निकलती है जिसका भुगतान इंसान को अपने अंतिम समय में करना पड़ता है, खैर मैं भी क्या कर सकता था जब दुनिया के मालिक को ही अभी उनकी परवाह नहीं थी तो मैं तो एक आम इंसान था । 

      मैं चाय वाले की दुकान पर गया, यहाँ पहले से ही दो चार आदमी बैठे हुए थे जो चाय पी रहे थे, मैंने भी चाय पी वाकई बड़ी ही लाजबाब चाय थी, कीमत सिर्फ पांच रुपये थी, चाय वाला कह रहा था कि अब हमारा कासगंज भी उन्नति कर रहा है यहाँ से कोलकाता , मुंबई के लिए गाड़ी जाने लगी हैं, एक तो कामख्या भी जाती है , बस कुछ दिन बाद दिल्ली की भी शुरू हो जाएँ तो मेरी दुकान की मौज आ जाए, तब एक ने कहा कि  तब तक तो इस दुकान का मालिक तुम्हारा बेटा ही होगा तुम तो मुल्तान( स्वर्ग) चले जाओगे,

      तो चाय वाला हँसा और कहा जब अपने सामने कोलकाता , जयपुर की गाड़ी देख ली तो दिल्ली क्या चीज़ है, अब ये वो भारत नहीं रहा जब लोग जिन्दगी भर अपनों से दूर रहकर चिठ्ठियाँ लिखते थे , आज एक मिनट में ही कही भी, किसी से भी बात कर लो वो भी पूरी दुनिया में , मुझे उसकी बात सुनकर रिलायंस की बात याद आ गई,  कर लो दुनिया मुठ्ठी में । 

      चाय पीकर मैं स्टेशन वापस आया तो देखा कि ट्रेन प्लेटफोर्म पर लग चुकी थी , मुख्य द्वार से काफी दूर , यहाँ प्लेटफोर्म नंबर एक की मीटर गेज लाइन अब उखाड़ दी गई थी , मैं ट्रेन के नजदीक पहुंचा तो सभी डिब्बों में पंखे बंद थे , सिर्फ एक डिब्बे में चल रहे थे , यहाँ पहले से भी लोगबाग सोये पड़े थे , मैंने भी एक पंखा चलाया और सो गया । सुबह आँख खुली तो देखा ट्रेन कासगंज से विदा हो रही थी , मैं भागकर आगे के डिब्बे में गया और चढ़ गया । आज काफी दिन बाद मीटर गेज की ट्रेन में बैठकर मुझे काफी ख़ुशी  महसूस हो रही थी । 

आगरा कैंट पर  उदयपुर खुजराहो  इंटरसिटी एक्सप्रेस 

कासगंज जंक्शन रेलवे स्टेशन
रूहेलखंड एक्सप्रेस कासगंज स्टेशन पर