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Sunday, July 30, 2017

AJABGARH FORT




अजबगढ़ की ओर 

       नारायणी मंदिर से निकलते ही मौसम काफी सुहावना हो चला था। आसमान में बादलों की काली घटायें छाई हुईं थीं। बादल इसकदर पहाड़ों को थक लेते थे कि उन्हें देखने से ऐसा लगा रहा था जैसे हम अरावली की वादियों में नहीं बल्कि हिमालय की वादियों में आ गए हों। घुमावदार पहाड़ी रास्तों पर बाइक अपने पूरे वेग से दौड़ रही थी, यहाँ से आगे एक चौराहा मिला जहाँ से एक रास्ता भानगढ़ किले की तरफ जाता है और सामने की ओर सीधे अजबगढ़,  जो यहाँ से अभी आठ किमी दूर था।

      हम एक नल से हाथ मुहँ धोकर अजबगढ़ की तरफ रवाना हो गए। एक छोटा सिंगल सा रास्ता है घने जंगलों के बीच होकर जो सीधे अजबगढ़ होते हुए अलवर को जाता है। यहाँ दोनों तरफ पहाड़ियां हैं इसलिए यह रास्ता जंगली है। अजबगढ़ पहुँच कर एक तरफ की पहाड़ियां समाप्त हो जाती है और रास्ता पहाड़ की तलहटी में बसे अजबगढ़ किले के बीच से होकर गुजरता है। सड़क के दोनों तरफ किले में बसी बस्तिओं और मकानों के अवशेष, खण्डरों के रूप में आज भी देखे जा सकते हैं। पहाड़ की तलहटी में निर्मित इस किले का एक मात्र मंदिर काफी देखने लायक है। मैं और उदय भी इस मंदिर को देखने गए, मंदिर के कपाट बंद थे, खोलकर देखा तो भगवान श्रीराम की एक तस्वीर रखी हुई थी।