Monday, October 23, 2017

RAJGIR


   राजगीर या राजगृह - एक पर्यटन यात्रा 

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      मेरी ट्रेन सुबह ही राजगीर पहुँच गई थी, जनरल कोच की ऊपर वाली सीट पर मैं सोया हुआ था, एक बिहारिन आंटी ने मुझे नींद से उठाकर बताया कि ट्रेन अपने आखिरी स्टेशन पर खड़ी है। मैं ट्रेन से नीचे उतरा तो देखा एक बहुत ही शांत और खूबसूरत जगह थी ये, सुबह सुबह राजगीर की हवा मुझे एक अलग ही एहसास दिला रही थी कि मैं रात के चकाचौंध कर देने वाले गया और पटना जैसे शहरों से अब काफी दूर आ चुका था। हर तरफ हरियाली और बड़ी बड़ी पहाड़ियाँ जिनके बीच राजगीर स्थित है। यूँ तो राजगीर का इतिहास बहुत ही शानदार रहा है, पाटलिपुत्र ( पटना ) से पूर्व मगध साम्राज्य की राजधानी गिरिबज्र या राजगृह ही थी जिसका कालान्तर में नाम राजगीर हो गया।



मगध साम्राज्य 

छटी शताब्दी ई.पू. में मगध एक छोटा सा साम्राज्य था किन्तु मगध पर शासन करने वाले राजा अत्यन्य ही महत्वकांक्षी थे अतः उन्होंने अपने पड़ोसी राज्यों पर आक्रमण कर मगध साम्राज्य का विस्तार किया और भारत का सबसे शक्तिशाली राज्य बनाया। मगध साम्राज्य की स्थापना का श्रेय महाभारत कालीन बृहद्रथ को जाता है। बृहद्रथ, चेदिराज बसु के पुत्र थे जिन्होंने अपना स्वतंत्र राज्य स्थापित कर बृहद्रथ वंश की नींव रखी, और मगध की राजधानी राजगृह को बनाया। बृहद्रथ के बाद इस वंश का सबसे प्रतापी राजा जरासंध था जो भगवान श्री कृष्ण का घोर शत्रु था तथा कंस का ससुर था।

जरासंध 

जरासंध का जन्म दो टुकड़ों में हुआ था इसकारण महाराज बृहद्रथ ने इसे शमशान में फिंकवा दिया। राजगृह के जंगलों में उनदिनों जरा नामकी राक्षसी विचरण करती हुई शमशान में पहुंची,  उसने उन दोनों टुकड़ों को अपने तप और तंत्र की शक्ति से आपस में जोड़ दिया और महाराज बृहद्रथ के पास पहुंचा दिया और साथ ही यह घोषणा भी कि यही बड़ा होकर इस मगध राज्य का सबसे प्रतापी और शक्तिशाली राजा बनेगा जिसके बाजुओं में बारह हजार हाथियों का बल होगा। जरासंध ने मथुरा पर सत्रह बार आक्रमण किया और भगवान कृष्ण को मथुरा छोड़कर द्वारिका जाने पर विवश कर दिया।  वह भगवान कृष्ण को ललकारने के लिए राजगृह से एक ढेला घुमाकर फेंकता था जो वृन्दावन - मथुरा में जाकर गिरता था और उसी ढेले से मथुरावासियों के घर तबाह हो जाते थे। अंत में भीम द्वारा जरासंध का वध उसे दो टुकड़ों में विभाजित करके हुआ और ये दोनों टुकड़े भीम द्वारा विपरीत दिशाओं में फेंके जाने पर जरासंध की मृत्यु हुई।

जरासंध की मृत्यु के बाद मगध पर अनेक शासकों ने राज किया किन्तु बृहद्रथ वंश का अंतिम शक्तिशाली शासक रिपुंजय था जिसकी हत्या उसी के मंत्री पुलिक ने कर दी और अपने पुत्र को मगध का शासक बनाया। भट्टिय नामक वीर महत्वकांक्षी सामंत ने पुलिक के पुत्र का वध करवा दिया और अपने पुत्र को मगध का सम्राट घोषित किया। इसी का नाम बिम्बिसार था जिसे हर्यक वंश का संस्थापक माना जाता है।

बिम्बिसार

सिंहासन पर आसीन होने के बाद बिम्बिसार ने अनेक वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित किये और साथ ही अंग के साम्राज्य को मगध में मिलाया। अंग,  दानवीर कर्ण का राज्य था जो महाभारत के समय अपने चरम पर था।
बिम्बिसार के शासनकाल में मगध की सीमायें दुगनी हो गई , माना जाता है कि बिम्बिसार के शासनकाल में मगध का विस्तार 300 योजन तक था। राजगृह में महात्मा बुद्ध का आगमन बिम्बिसार के समय में ही हुआ, बिम्बिसार ने बौद्धधर्म ग्रहण कर महात्मा बुद्ध की काफी सेवा की। 'जीवक' नामक राजवैध भी बिम्बिसार के शासनकाल में ही थे जिन्होंने सच्ची निष्ठां से भगवान महात्मा बुद्ध का उपचार किया था।  492 ई. पू. बिम्बिसार की मृत्यु हो गई।

अजातशत्रु

बिम्बिसार की मृत्यु के बाद उसका पुत्र अजातशत्रु मगध का शासक बना। इतिहास में अजातशत्रु को पितृहन्ता कहा जाता है जिसने राज्य के लालच में अपने पिता की हत्या की। परन्तु जैन अनुश्रुतियों में उसे पिता का हत्यारा नहीं माना जाता है। जो भी हो इतना तो अवश्य सत्य है कि वह एक महान योद्धा और साम्राज्य विस्तारवाद नीति का समर्थक था। उसने अपने बाहु और बुद्धि बल द्वारा मगध की सीमाओं में काफी वृद्धि की।
प्रथम बौद्ध संगीति का आयोजन वैभारगिरि पर्वत पर जिसे राजगीर पर्वत भी कहा जाता है,  स्थित सप्तपर्णी गुफा में अजातशत्रु के शासनकाल में ही संपन्न हुआ।

अजातशत्रु के बाद उसका पुत्र उदयभद्र भी इस वंश का प्रतापी और योग्य शासक हुआ जिसने मगधपर 33 वर्षों तक राज्य किया इसके बाद अनेक उत्तराधिकारी इस वंश में हुए परन्तु बिम्बिसार, अजातशत्रु और उदयभद्र के समान साम्राज्यवादी और महत्वकांक्षी नहीं थे। हर्यक वंश समाप्त होने के बाद मगध में शिशुनाग वंश का उदय हुआ और इस वंश का प्रतापी राजा शिशुनाग ही था जिसने मगध की राजधानी राजगृह से हटाकर वैशाली स्थानांतरित की। इस प्रकार राजगीर की भूमि का इतिहास जरासंध, बिम्बिसार, अजातशत्रु तक ही सीमित होकर रह गया।

आज राजगीर की भूमि पर प्राचीन मगध के कुछ अवशेष थे जो निम्न प्रकार हैं।

  • अजातशत्रु का किला 
  • ब्रह्मकुंड और सूर्यकुंड - गर्म पानी के झरने 
  • वैभारगिरि पर्वत या राजगीर पर्वत 
  • सप्तपर्णी गुफा 
  • ज़रा देवी और जरासंध का मंदिर 
  • सोनभंडार गुफा - बिम्बिसार का सोने का खजाना 
  • जरासंध का अखाडा 
  • मनियर मठ 
  • विश्व शांति स्तूप 
  • बिम्बिसार की जेल 
  • वेणुवन - महात्मा बुद्ध का विहार स्थल 
  • जीवक का दवाखाना   

इसके अलावा जापानी मंदिर, जैन धर्म के अन्य मंदिर और पर्वतमालाएं, मखदूम कुंड भी दर्शनीय हैं।

RAJGIR RAILWAY STATION, BIHAR

RAJGIR RAILWAY

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1 comment:

  1. ऐतिहासिक यात्रा कराता लेख..

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