Sunday, July 2, 2017

DEHRADUN 17




देहरादून घंटाघर और वापसी


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            नीलकंठ से लौटने के बाद अब हमारा प्लान मसूरी जाने का बना इसके लिए देहरादून पहुँचना जरुरी था, इसलिए हम सबसे पहले ऋषिकेश बस स्टैंड पहुँचे। यहाँ पहाड़ों में ऊपर जाने वाली बसें भी खड़ी हुई थी और कुछ बसें दिल्ली जाने के लिए भी खड़ी हुई थी। तभी  देहरादून की एक बस आई, साधना , भरत और मामी जी बस में चढ़ गए और मैं अपनी बाइक से देहरादून की तरफ रवाना हो गया। रास्ता शानदार था और घने जंगलों के बीच से होकर गुजरता है। डोईवाला के बाद जंगल समाप्त हो जाते हैं, और देहरादून का शहरीय क्षेत्र शुरू हो जाता है।



     हम देहरादून पहुंचने में काफी लेट हो चुके थे इसलिए मसूरी जाने का तो सवाल ही नहीं उठता। मैं देहरादून के घंटाघर पहुँचा और साधना की बस का इंतज़ार  करने लगा। घंटाघर वो जगह थी जहाँ बचपन में मेरी माँ और मेरे बड़े मामा ,नानाजी के साथ यहाँ रहे थे। घंटाघर देहरादून की प्राचीन जगहों में से एक है यहाँ से पहाड़ों में मसूरी साफ़ दिखाई देती है। आज रविवार है इसलिए देहरादून का बाजार आज बंद था, घंटाघर के किनारे काफी बड़ा फड़ बाजार लगा हुआ था। कुछ देर बाद साधना भी अपने बच्चों के साथ यहाँ आ गई।

     अब हमारा कहीं भी जाने का विचार नहीं था। हम सीधे यहाँ से रेलवे स्टेशन गए, और काफी देर यहाँ बैठे रहे। आगरा जाने के लिए ट्रेन सुबह थी परन्तु साधना यहाँ रुकना नहीं चाहती थी। रात को मसूरी एक्सप्रेस दिल्ली जाने को तैयार खड़ी थी। साधना ने इसी ट्रेन से जाने की इच्छा व्यक्त की, मैंने सोचा ये तो चली जाएगी पर मैं बाइक लेकर रात में कैसे जाऊँगा ? पर जो भी हो देखा जाएगा, साधना को मसूरी एक्सप्रेस से दिल्ली के लिए विदा कर दिया। अब मैं और कल्पना अकेले रह गए। यह वो वक़्त था जब मुझे दिल से दुखी जैसा फील हो रहा था, साधना के जाने से मुझे वाकई बहुत दुःख हुआ क्योंकि उसके जाने से यात्रा की भी समाप्ति हो चली थी अब वापसी की तैयारी थी।

     मसूरी एक्सप्रेस के जाने के बाद हम कुछ देर स्टेशन पर बैठे रहे और मोबाइल चार्जर में लगा दिया। अब मेरा मन यहाँ बिलकुल भी नहीं लग रहा था। मोबाइल चार्ज करने के बाद मैंने भी अपनी बाइक उठाई और घर की तरफ निकल पड़ा। मैं यहाँ से अब सहारनपुर रोड पर बाइक चला रहा था। जब तक मैं सिटी में था तब तक तो यात्रा ठीक थी, किंतु देहरादून की शहरीय सीमा समाप्त होते ही घना जंगल शुरू हो गया था, रात के दस बज चुके थे, भयंकर सन्नाटा और अँधेरा हमें अब डराने लगा था। परन्तु चन्द्रमा की रौशनी हमें गाडी चलने की हिम्मत दे रही थी।

     रोड शानदार था, काफी घुमावदार सड़कें थी बस डर था तो किसी जंगली जानवर के मिलने का। तभी सामने एक पुलिस चेकपोस्ट दिखाई दिया, एक पुलिसवाले ने हमें रुकने को कहा परन्तु पीछे कल्पना (लेडीज) को देखकर उसने हमें रोका नहीं। उसके बाद एक उत्तराखंड की बस भी आ गई जो सहारनपुर जा रही थी और उसके पीछे पुलिस चेकपोस्ट से लौटकर आये तीन बाइक पर कुछ घुमक्कड़। इन्ही के साथ मैंने भी उत्तराखंड की सीमा को नाप दिया और बिहारीगढ़ पर आकर इनका साथ छोड़ दिया।

        यहाँ से आगे अब कल्पना को नींद आने लगी थी और रास्ते में कहीं कहीं गड्ढे भी आ रहे थे जो दिखाई नहीं दे रहे थे। छुटमलपुर पर आकर मैंने सहारनपुर रोड छोड़ दिया और रुड़की की तरफ रख कर दिया करीब 25 किमी बाद हम मेरठ - हरिद्वार हाईवे पर थे। अब कल्पना का धैर्य जबाव दे गया। रात के बारह बज चुके थे,  मुझे यकीन था कि नींद की एक झपकी आने पर यह बाइक से तुरंत गिर सकती थी, इसी वजह से मैंने गाडी एक ढाबे पर लगाई और एक चारपाई लेकर सो गया।  सुबह पांच बजे उठकर हमने फिर से अपनी यात्रा शुरू की और ग्रेटर नोएडा होते हुए, एक्सप्रेसवे के जरिये 11 बजे तक मैं अपने घर मथुरा पहुँच गया।

ऋषिकेश बस स्टैंड 

देहरादून - ऋषिकेश मार्ग 


घंटाघर , देहरादून 

DEHRADUN CLOCK TOWER 



यात्रा के लिए धन्यवाद 

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