Sunday, August 5, 2018

BATESHWAR TEMPLE


बटेश्वर धाम - आगरा 

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       अब शाम करीब ही थी और मैं अभी भी आगरा से 72 किमी दूर बाह में ही था। नौगांवा किले से लौटने के बाद अब हम भदावर की प्राचीन राजधानी बाह में थे। मैंने सुना था कि यहाँ भी एक विशाल किला है परन्तु कहाँ है यह पता नहीं था। बस स्टैंड के पास पहुंचकर राजकुमार भाई को भूख लग आई पर उनका एक उसूल था कि वो जब तक मुझे कुछ नहीं खिलाएंगे खुद भी नहीं खाएंगे इसलिए मजबूरन मुझे भी कुछ न कुछ खाना ही पड़ता था। रक्षा बंधन का त्यौहार नजदीक था इसलिए मिठाइयों की दुकानें घेवरों से सजी हुई थीं। मैंने अपने लिए घेवर लिया और भाई ने वही पुरानी समोसा और कचौड़ी। दुकानदार से ही हमने किले के बारे में और बटेश्वर के लिए रास्ता पूछा। उसने हमें बाजार के अंदर से होकर जाती हुई एक सड़क की तरफ इशारा करते हुए कहा कि ये रास्ता सीधे बटेश्वर के लिए गया है इसी रास्ते पर आपको बाह का किला भी देखने को मिल जायेगा। 

NOUGANWA FORT


नौगँवा किला - एक पुश्तैनी रियासत

पिछली यात्रा - पिनाहट किला 
   
     अटेर किला न जा पाने के कारण अब हमने बाह की तरफ अपना रुख किया। पिनाहट से एक रास्ता सीधे भिलावटी होते हुए बाह के लिए जाता है। इस क्षेत्र में अभी हाल ही में रेल सेवा शुरू हुई है जो आगरा से इटावा के लिए नया रेलमार्ग है। इस रेल लाइन का उद्घाटन भूतपूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी बाजपेई के समय में हुआ था किन्तु कुछ साल केंद्र में विपक्ष की सरकार आने की वजह से इस रेल मार्ग को बनाने का काम अधूरा ही रहा। अभी हाल ही में ही रेल लाइन पर रेल सेवा शुरू हुई है। यह रेल मार्ग अब हमारे सामने था, जिसे पार करना हमें मुश्किल दिखाई दे रहा था। रेलवे लाइन के नीचे से सड़क एक पुलिया के जरिये निकलती है जिसमे अभी बहुत अत्यधिक ऊंचाई तक पानी भरा हुआ था इसलिए मजबूरन हमें बाइक पटरियों के ऊपर से उठाकर निकालनी  पड़ी और हम भिलावटी गांव पार करते हुए बाह के रेलवे स्टेशन पहुंचे। 

PINAHAT FORT


चम्बल किनारे स्थित -  पिनाहट किला

    आज मेरा जन्मदिन था और आज सुबह से बारिश भी खूब अच्छी हो रही थी इसलिए आज मैं कहीं घूमने जाना चाहता था इसलिए मैंने भिंड में स्थित अटेर दुर्ग को देखने का प्लान बनाया। परन्तु मैं वहाँ अकेला नहीं जाना चाहता था इसलिए मैंने अपने साथ किसी मित्र को ले जाने के बारे में सोचा। आगरा में मेरे एक मित्र भाई है जिनका नाम है राजकुमार चौहान, मैंने आज कई सालों बाद उन्हें फोन किया तो मेरा फोन आने पर उन्हें कितनी ख़ुशी हुई ये मैं बयां नहीं कर सकता। उनके पास मेरा नंबर नहीं था और आगरा से मथुरा आने के बाद मैंने उनके पास कभी फोन नहीं किया, आज अचानक मेरा फोन आने से वो बहुत खुश हुए। 

Monday, July 23, 2018

MT. ABU


आबू पर्वत की एक सैर

     महीना मानसून का चल रहा था और ऐसा शायद ही कभी हुआ हो कि मानसून आ चुका हो और हम यात्रा पर ना निकलें हों। जुलाई के इस पहले मानसून में मैंने राजस्थान के सबसे बड़े और ऊँचे पर्वत, आबू की सैर करने का मन बनाया। इस यात्रा में अपने सहयात्री के रूप में कुमार को फिर से अपने साथ लिया और आगरा से अहमदाबाद जाने वाली ट्रेन में दोनों तरफ से मतलब आने और जाने का टिकट भी बुक करा लिया। 23 जुलाई को कुमार आगरा फोर्ट से ट्रेन में बैठा और मैं अपनी बाइक लेकर भरतपुर पहुंचा और वहीँ से मैं भी इस ट्रेन में सवार हो लिया और हम दोनों आबू पर्वत की तरफ निकल पड़े।

Saturday, July 14, 2018

MARIAM TOMB



मरियम -उज़ -जमानी का मक़बरा 

     सन 1527 में बाबर ने जब फतेहपुर सीकरी से कुछ दूर उटंगन नदी के किनारे स्थित खानवा के मैदान में अपने प्रतिद्वंदी राजपूत शासक राणा साँगा को हराया तब उसे यह एहसास हो गया था कि अगर हिंदुस्तान को फतह करना है और यहाँ अपनी हुकूमत स्थापित करनी है तो सबसे पहले हिंदुस्तान के राजपूताना राज्य को जीतना होगा, इसके लिए चाहे हमें ( मुगलों ) को कोई भी रणनीति अपनानी पड़े। बाबर एक शासक होने के साथ साथ एक उच्च कोटि का वक्ता तथा दूरदर्शी भी था। इस युद्ध के शुरुआत में राजपूतों द्वारा जब मुग़ल सेना के हौंसले पस्त होने लगे तब बाबर के ओजस्वी भाषण से सेना में उत्साह का संचार हुआ और मुग़ल सेना ने राणा साँगा की सेना को परास्त कर दिया और यहीं से बाबर के लिए भारत की विजय का द्धार खुल गया। इस युद्ध के बाद बाबर ने गाज़ी की उपाधि धारण की।  


     बाबर की इस दूरदर्शी सोच और उसकी रणनीति को उसके पौत्र अकबर ने भलीभाँति समझा और इसी के अनुसार उसने हिन्दुस्तान में राजपूतों से सम्बन्ध स्थापित किये। अकबर का जन्म भी उमरकोट के राणा वीरसाल के यहाँ हुमाँयु की पत्नी हमीदाबानो के गर्भ से हुआ था। उसका बचपन हिन्दू राजपूतों के मध्य ही गुजरा। अपने पिता की असमय मृत्यु के बाद पंजाब के कलनौर में 13 वर्ष की अवस्था में अकबर का राजतिलक हुआ और उसके बाद उसने छिन्न भिन्न मुग़ल साम्रज्य को संगठित कर अपना एक छत्र साम्राज्य स्थापित किया। वह जानता था कि उसके लिए सबसे बड़ी चुनौती वाला जो राज्य है वो राजपूताना ही है क्योंकि राजपूत अत्यंत ही महत्वकांक्षी थे और बाबर के विरूद्ध हुई खानवा के युद्ध में अपनी पराजय का बदला लेने को आतुर थे। 

     अधिकतर राजपूत राजाओं ने अकबर की शान्त और स्वायत्ता से संतुष्ट होकर आत्म समपर्ण कर दिया।  इन्हीं में आमेर के राजा भारमल नाम भी बड़े तबके के साथ लिया जाता है। उन्होंने मुगलों की आधीनता ही स्वीकार नहीं की बल्कि उनसे वैवाहिक संबंध भी स्थापित किये। राजा भारमल ने अपनी पुत्री जोधाबाई जिसे हरकाबाई के नाम से भी जाना जाता है का विवाह मुग़ल बादशाह अकबर के साथ किया। इसके बाद ही अकबर को राजपूतों पर अपना अधिपत्य स्थापित करने में आसानी हुई। हालांकि अनेक राजपूत ऐसे भी थे जिन्होंने अकबर की आधीनता कभी स्वीकार नहीं की जिनमे मेवाड़ के शासक महाराणा प्रताप का नाम शिरोमणि है। 

     जोधाबाई एक हिन्दू राजपूत स्त्री थी। मुगलों के बीच रहकर भी उसने कभी अपना हिंदुत्व नहीं त्यागा। उसने सम्राट अकबर की पत्नी होने के सारे फ़र्ज़ अपने धर्म के साथ ही निभाए थे। हिंदुस्तान की मलिका होने के बाबजूद भी उसमें कभी अहम की भावना नहीं थी जबकि अकबर की अन्य पत्नियाँ उससे द्धेष की भावना रखती थीं क्योंकि उसके व्यक्तिगत स्वभाव और व्यवहार के कारण अकबर उसे अपनी सबसे प्रिय रानी के रूप में देखता था। जोधाबाई ने अपने जीतेजी और मरने के बाद भी दोनों धर्मों को पूरी निष्ठा से निभाया। 

      जहाँगीर की आत्मकथा तुजुके जहाँगीरी में जोधाबाई के नाम के स्थान पर मरियम उज़ ज़मानी के नाम से जाना गया है। जोधाबाई की मृत्यु उपरांत हिन्दू होने के कारण उनका दाह संस्कार किया गया था, जिस स्थान पर उनका दाह संस्कार हुआ वहां राजपूत होने के कारण उनकी छतरी का निर्माण किया गया। यह स्थान आज भी आगरा के अर्जुन नगर में स्थित है और मुग़ल बेग़म होने के कारण उनका मकबरा, अकबर के मकबरे से कुछ दूर आगरा - दिल्ली राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित है जिसे मरियम के मकबरे के नाम से जाना जाता है। 

मरियम का मकबरा 

MARIAM TOMB

SUDHIR UPADHYAY AT MARIYAM TOMB

MARIAM TOMB

MARIAM TOMB

MARIAM TOMB

MARIAM GRAVE

MARIAM TOMB

MARIAM TOMB


MARIAM TOMB

MARIAM TOMB

MARIAM TOMB

MARIAM TOMB


MARIAM TOMB

MARIAM TOMB

Friday, June 29, 2018

KGM TO MTJ - NADRAI BRIDGE


काठगोदाम से मथुरा - आखिरी पड़ाव नदरई पुल, कासगंज। 


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   सोरों देखने के बाद हम अपने आखिरी पड़ाव कासगंज पहुंचे। वैसे तो कासगंज कुछ समय पहले तक एटा जिले का ही एक भाग था परन्तु अप्रैल 2008 में इसे उत्तर प्रदेश का 71वां जिला बना दिया गया। बहुजन समाजवादी पार्टी के संस्थापक कांशीराम की मृत्यु वर्ष 2006 में हो गई थी उन्हीं की याद में उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री सुश्री मायावती ने इसे कांशीराम नगर के नाम से घोषित किया गया। कासगंज पूर्वोत्तर रेलवे का एक मुख्य जंक्शन स्टेशन है जहाँ से बरेली, पीलीभीत, मैलानी तथा फर्रुखाबाद, कानपुर और लखनऊ के लिए अलग से रेलवे लाइन गुजरती हैं। हालाँकि कासगंज गंगा और यमुना के दोआब में स्थित होने के कारण काफी उपजाऊ शील जिला है यहाँ की मुख्य नदी काली नदी है। 

KGM TO MTJ - SORON


काठगोदाम से मथुरा - सोरों शूकर क्षेत्र

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     गंगा स्नान के बाद हमारा अगला पड़ाव सोरों शूकर क्षेत्र था।  इस क्षेत्र को शूकर क्षेत्र इसलिए कहते हैं क्योंकि यहाँ भगवान विष्णु के दूसरे अवतार श्री वराह भगवान का प्रसिद्ध मंदिर स्थित है। भगवान विष्णु ने पृथ्वी को दैत्यराज हिरण्याक्ष से बचाने के लिए ब्रह्मा जी की नाक से वराह के रूप में प्रकट होकर पृथ्वी की रक्षा की थी। जब दैत्यराज हिरण्याक्ष पृथ्वी को समुद्र के रसातल में छुपा आया तब भगवान वराह ने अपनी थूथनी की सहायता से पृथ्वी का पता लगाया और समुद्र में जाकर हिरण्याक्ष का वध करके पृथ्वी को अपने दाँतों पर रखकर बाहर आये।

KGM TO MTJ - KACHHLA GHAT


काठगोदाम से मथुरा - कछला घाट 

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      कछला घाट पहुंचकर देखा तो रेलवे ने अपना वाला पुराना मार्ग बंद कर दिया है जहाँ से कभी रेलमार्ग और सड़कमार्ग एक होकर गंगा जी को पार करते थे। सड़क मार्ग अलग हो गया, मीटरगेज मार्ग भी बंद हो गया परन्तु पब्लिक है कि आज भी रेलवे के बिज के नीचे ही गंगा जी में नहाना पसंद करती है।  लोग आज भी अपनी उस आदत को नहीं बदला पाए जिसपर वर्षों से वे और उनके पूर्वज चलते आ रहे थे।  इसलिए जब रेलवे ही बदल गई तो मजबूरन लोगों की रेलवे ब्रिज की तरफ जाने की आदत को रेलवे ने ब्लॉक् कर दिया। अब मजबूरन लोगों को कछला नगर की तरफ से होकर ही गंगाजी में स्नान करने जाना पड़ता है और हमें भी जाना पड़ा। 

KGM TO MTJ



काठगोदाम से मथुरा की ओर

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      रात को काफी देर से सोने के बाद भी मेरी आँख सुबह जल्दी खुल गई, वेटिंग रूम से बाहर निकलकर देखा तो यात्रियों का आना शुरू हो चुका था। मैंने जल्दी ही अपनी बाइक प्लेटफोर्म से हटाकर बाहर खड़ी कर दी और फिर वापस आकर कल्पना को जगाया। घड़ी में सुबह के पांच बज चुके थे। हम तैयार होकर साढ़े पांच बजे तक फ्री हो गए और मैंने सही साढ़े पांच बजे अपनी बाइक काठगोदाम से मथुरा के लिए रवाना कर दी। काठगोदाम के बाद हल्द्वानी उत्तराखंड का प्रमुख नगर है। यहाँ मैंने इस स्टेशन के भी कुछ फोटो लिए और फिर आगे बढ़ चला। 

Thursday, June 28, 2018

KATHGODAM RAILWAY STATION



काठगोदाम रेलवे स्टेशन पर एक रात 


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     नौकुचियाताल के बाद अब हमने घर वापस लौटने की तैयारी शुरू कर ली थी, मैं घर पर माँ को बताकर नहीं आया था कि मैं नैनीताल बाइक से ही जा रहा हूँ, इस यात्रा के दौरान मैं उनसे यही कहता रहा कि मैं ट्रेन से ही आया हूँ हालाँकि मैं यहाँ से और आगे की यात्रायें भी कर सकता था परन्तु अब मुझसे अपनी माँ से सच नहीं छिपाया जा रहा था और मैं इससे अधिक उनसे झूठ भी नहीं बोल सकता था। अब मेरे मन और दिल ने मुझे धिक्कारना शुरू कर दिया था इसीलिए मैंने अब वापसी की राह ही चुनी। मैं शीघ्र से शीघ्र घर लौट जाना चाहता था इसलिए नौकुचिया के बाद मेरी बाइक का रुख अब घर की तरफ हो चला था। 

      शाम करीब ही थी, थोड़ी देर में सूरज भी ढलने ही वाला था और हम अभी भी जमीन से बहुत ऊँचाई पर थे, मैं अँधेरा होने से पहले ही इन पहाड़ों से नीचे उतरजाना चाहता था इसलिए बाकी के सभी तालों को छोड़कर मैं काठगोदाम की तरफ रवाना हो गया जो कुमाँयू का प्रवेश द्धार था। मैं वापस भीमताल पहुंचा और यहाँ से मैंने नीचे की तरफ उतरना शुरू कर दिया, यह रास्ता देखने में अत्यंत ही खतरनाक था परन्तु शानदार भी था। गहरी घाटियों के बीच मेरी बाइक धीरे धीरे नीचे की तरफ उतर रही थी और मुझे यही लग रहा था कि बस थोड़ी देर में मैं काठगोदाम पहुँच जाऊँगा, परन्तु शायद मैं गलत था। काठगोदाम नीचे जरूर था किन्तु इतना भी पास नहीं था जितना मैं सोचता आ रहा था।  

     रास्ते में पहाड़ों पर मक्का की खेती भी एक शानदार नजारा थी, यहाँ मैंने कुछदेर रुककर गर्म गर्म भुटिया कल्पना को खिलाई और बारिश के रुकने का इंतज़ार किया। पहाड़ी बरसात का कोई भरोशा नहीं होता कभी भी शुरू हो जाती है कभी भी बंद। अँधेरा होने तक मैं काठगोदाम पहुँच चुका था, मैं पहली बार काठगोदाम आया था और आते ही तेज बारिश ने हमारा जोरदार स्वागत किया। एक बड़े पेड़ के नीचे हमने स्वयं को भीगने से बचाया। माँ से किये वादे के अनुसार मुझे यहाँ भी रेलवे का ही सहारा लेना पड़ा जो मैं इस यात्रा में शुरू से लेता ही आ रहा था। हम सबसे पहले रेलवे स्टेशन पहुंचे, यह पूर्वोत्तर रेलवे का आखिरी स्टेशन है और काफी शानदार बना हुआ है। बाइक बाहर खडी कर हम प्लेटफार्म पर पहुंचे और यहाँ अपना स्थान जमाकर कुछ देर मोबाइल फोन को चार्ज किया। 

     मैं कल्पना के लिए बाहर से एक होटल वाले से खाना पैक कराकर लाया, वो होटल वाला भी ब्रजभाषा बोल रहा था और उसका स्टाफ भी। मुझे यह सुनकर बड़ा आश्चर्य हुआ कि कुमांयूनी प्रदेश में मेरी ब्रजभाषा .. जो शायद कई दिन बाद मैंने सुनी थी, मैंने उस होटल वाले से पुछा तो उसने बताया कि वो फ़िरोज़ाबाद का रहने वाला है और इस होटल के मालिक भी फ़िरोज़ाबाद के ही हैं। जब उसे पता चला कि मैं मथुरा से यहाँ बाइक से आया हूँ तो वह बड़ा चकित हुआ और खुश भी इसलिए उसने मुझे खाना भी फिरउसी रेट से दिया जिस रेट से ब्रज में मुझे मिलना चाहिए था । मैं खाना लेकर स्टेशन पहुंचा, रानीखेत एक्सप्रेस चलने के लिए तैयार खड़ी हुई थी इसके बाद बाघ एक्सप्रेस का नंबर था। 

     बाघ एक्सप्रेस के चले जाने के बाद स्टेशन एक दम खाली हो गया। अब प्लेटफॉर्म पर हम और रेलवे के कुछ कर्मचारी ही बचे थे। माँ के रेलवे पास के जरिये मैंने वेटिंग रूम में ही अपना बिस्तर लगाया और कल्पना को सुला दिया। अब मुझे बाइक का भी कुछ इंतज़ाम करना था, यहाँ पार्किंग केवल दिन में ही लगती है रात के समय वहां कोई नहीं होता, इसलिए मैंने अपनी बाइक को प्लेटफॉर्म पर ही खड़ा कर दिया और आराम से सो गया। 

काठगोदाम की तरफ लौटने में पहाड़ 


काठगोदाम की तरफ 

कुमाँयू 


काठगोदाम में एक चौराहा 

बरसात के रुकने तक इसी पेड़ के नीचे हम रुके रहे 


रात्रि के समय काठगोदाम स्टेशन का एक दृशय 

काठगोदाम रेलवे स्टेशन 

काठगोदाम पर रानीखेत 



   

अगली यात्रा - मथुरा की तरफ वापसी